Dr. Bashir Mahmud Ellias's Blog

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Cancer and its easy treatment in homeopathy

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ক্যান্সারের  বিপদজনক  চিকিৎসা

 

            মনীষীদের  মতে,  অজ্ঞতা  হলো  মানবজাতির  সবচেয়ে  বড়  সমস্যা।  অজ্ঞতা  বা  না  জানার  কারণে  আমরা  জীবনে  অল্প-বেশী  বিভিন্নভাবে  বঞ্চিত  হতে  পারি  বা  ক্ষতিগ্রস্থ  হতে  পারি ।   কিন্তু  অসুখ-বিসুখ  এবং  তাদের  চিকিৎসার  ব্যাপারটি  এতই  মারাত্মক  যে,  এই  ব্যাপারে  সামান্য  অজ্ঞতার  কারণে  আপনি  সারা  জীবনের  জন্য  পঙ্গু  হয়ে  যেতে  পারেন  কিংবা  অকাল  মৃত্যুর  শিকার  হতে  পারেন । সম্প্রতি  জাতীয়  দৈনিকগুলোর  এক  রিপোর্টে  উল্লেখ  করা  হয়েছে  যে,  আমাদের  দেশে  প্রতি  বছর  দুই  লক্ষ  মানুষ  নতুন  করে  ক্যান্সারে  আক্রান্ত  হয়ে  থাকেন ;  যাদের  মধ্যে  পঞ্চাশ  হাজার  রোগী  দেশে-বিদেশে  বিভিন্ন  ধরণের  চিকিৎসা  নিয়ে  থাকেন  আর  বাকী  দেড়  লক্ষ  রোগী  কোন  চিকিৎসা  সুবিধা  পায়  না ।  কবিরাজি,  এলোপ্যাথি  এবং  হোমিওপ্যাথি  এই  তিনটি  বিষয়ে  যার  গভীর  পড়াশোনা  আছে  তিনি  নির্দ্বিধায়  স্বীকার  করবেন  যে,  কবিরাজি  হলো  প্রাইমারী  মেডিক্যাল  সাইন্স,  এলোপ্যাথি  হলো  স্ট্যান্ডার্ড  মেডিকেল  সাইন্স  এবং  হোমিওপ্যাথি  হলো  এডভান্সড  মেডিক্যাল  সাইন্স ।  আর  এই  কারণে  অন্যান্য  জটিল  রোগের  মতো  টিউমার  এবং  ক্যান্সারের  চিকিৎসাতেও  হোমিও  ঔষধ  শ্রেষ্টত্বের  দাবীদার ।  হোমিও  ডাক্তাররা  দুইশ  বছর  পূর্ব  থেকেই  ঔষধের  সাহায্যে  টিউমার/ ক্যান্সার  নিরাময়  করে  আসছেন ।  অথচ  এলোপ্যাথিতে  ক্যান্সারের  ঔষধ  চালু  হয়েছে  মাত্র  পঞ্চাশ  বছর  যাবত ।  তার  পূর্বে    এলোপ্যাথিক  ডাক্তাররা  টিউমার/ ক্যান্সারের  রোগীদের  কোন  ঔষধ  দিতে  পারতেন  না।  টিউমার/ ক্যান্সারের  অবস্থান  সুবিধা  মতো  হলে  তারা  অপারেশন  করে  সারানোর  চেষ্টা  করতেন  আর  তা  না  হলে  ভালো-মন্দ  খেয়ে  নেওয়ার  উপদেশ  দিয়ে  রোগীদের  বিদায়  দিতেন।  ইদানীং  এলোপ্যাথিক  ডাক্তাররা  ক্যান্সার  সারানোর  জন্য  মারাত্মক  মারাত্মক  অনেকগুলো  কেমিক্যাল  ঔষধ  এক  নাগাড়ে  কয়েক  মাস  যাবত  রোগীদের  শরীরে  ইনজেকশন  দিয়ে  ঢুকিয়ে  দিয়ে  থাকেন।  একে  তারা  নাম  দিয়েছেন  কেমোথেরাপি (chemotherapy) ।  ক্যামোথেরাপির  ক্ষতিকর  পার্শ্ব-প্রতিক্রিয়া  এতই  বেশী  যে,  এতে  প্রায়  সকল  রোগীই  অকালে  করুণ  মৃত্যুবরণ  করতে  বাধ্য  হয়।  তবে  কেমোথেরাপির  সবচেয়ে  ক্ষতিকর  পার্শ্বপ্রতিক্রিয়া  হলো  ব্রেন  ড্যামেজ (brain  damage)  হয়ে  যাওয়া  অর্থাৎ  স্মরণশক্তি  নষ্ট  হয়ে  যায়।  কোন  কিছু  মনে  থাকে  না,  কোন  কথার  পরে  কোন  কথা  বলতে  হবে  তা  মাথায়  আসে  না,  একসাথে  একটার  বেশী  কাজ  করতে  পারে  না,  ছোটখাটো  ব্যাপারেও  সিদ্ধান্ত  নিতে  অনেক  সময়  লেগে  যায়,  অল্প  সময়ের  জন্য  সবকিছু  ভুলে  যায়,  কোন  নির্দিষ্ট  বিষয়ে  মনোযোগ  দিতে  পারে  না,  নতুন  কিছু  শিখতে  পারে  না  ইত্যাদি  ইত্যাদি।  ডাক্তাররা  এই  সমস্যার  নাম  দিয়েছে  ‘কেমোব্রেন’ (chemobrain)। 

 

 

            তাছাড়া  কেমোথেরাপির  আরো  যে-সব  মারাত্মক  সাইড-ইফেক্ট  আছে  তা  হলো  মুখে  ঘা  হওয়া (stomatitis),  পেটে  আলসার  হওয়া (gastric  ulcer),  মারাত্মক  রক্তশূণ্যতা (anaemia),  অপুষ্টি (malnutrition),  ওজন  কমে  যাওয়া (weight  loss),  চুল  পরে  যাওয়া (hairlessness),  লিভার-কিডনী-হার্টের  সর্বনাশ  হওয়া (Liver  damage),  শ্রবণশক্তি  নষ্ট  হওয়া  ইত্যাদি  ইত্যাদি।  কেমোথেরাপির  ধাক্কায়  রোগী  এতই  দুর্বল  হয়ে  পড়ে  যে,  সে  একেবারে  শয্যাশায়ী  হয়ে  পড়ে  অনেক  দিনের  জন্য।  সবচেয়ে  বড়  সমস্যা  হলো  কেমোথেরাপি  দিতে  যেহেতু  লক্ষ  লক্ষ  টাকা  ব্যয়  করতে  হয়,  সেহেতু  এই  চিকিৎসায়  উপকার  হোক  বা  না  হোক  চিকিৎসা  শেষে  অনেকেই  পথের  ভিখিরিতে  পরিণত  হয়ে  যান।  আবার  টাকার  অভাবে  অনেকে  এই  চিকিৎসাই  নিতে  পারেন  না।  অথচ  হোমিওপ্যাথিক  চিকিৎসায়  অন্তত  একশগুণ  কম  খরচে  টিউমার/ ক্যান্সার  সারানো  যায়  এবং  তাতে  রোগীর  স্বাস্থের  কোন  ক্ষতি  তো  হয়ই  না  বরং  আরো  উন্নতি  হয়।  একজন  হিন্দু  যুবকের  কথা  আমার  মনে  আছে  যার  লিম্ফ্যাটিক  গ্লান্ডে  ক্যান্সার (non-hodgkin’s  lymphoma)  হয়েছিল।  আমি  বলেছিলাম  এই  ভয়ঙ্কর  ক্যান্সার  যদি  ইতিমধ্যে  সারা  শরীরে  ছড়িয়ে  পড়ে  থাকে (metastasis),  তবে  হয়ত  হোমিও  চিকিৎসায়  তাকে  পুরোপুরি  সারানো  নাও  যেতে  পারে।  কিন্তু  তারপরও  হোমিও  ঔষধের  মাধ্যমে  ক্যান্সারের  অগ্রগতিকে  কমিয়ে  দিয়ে  রোগীকে  অনত্মত  পাঁচ-দশ  বছর  বাঁচিয়ে  রাখা  যাবে।  কিন্তু  সে  হোমিওপ্যাথির  ওপর  ভরসা  না  করে  রাতারাতি  সুস্থ  হওয়ার  আশায়  জায়গা-জমি  বিক্রি  করে  ভারতে  গিয়ে  কেমোথেরাপি  দিয়ে  আসে।  ভারতের  এলোপ্যাথিক  ডাক্তাররা  তাকে  রোগমুক্ত  সম্পূর্ণ  সুস্থ (?) বলে  ঘোষণা  করেন।  দেশে   এসে  সে  আবার  তার  চাকুরিতে  যোগদান  করে।  বাহ্যিকভাবে  তাকে  দেখতে  বেশ  সুস্থ-সবল-হৃষ্ট-পুষ্ট  মনে  হচ্ছিল  কিন্তু  দেড়  বছরের  মাথায়  সে  হঠাৎ  করে  মারা  যায়।  (আসলে  কেমোথেরাপি  এমনই  ভয়ঙ্কর  ঔষধ  যে  সেগুলো  প্রয়োগের  ফলে  শরীরের  কল-কব্জা  সব  ঢিলা  হয়ে  যায়।)  আর  অপারেশনের  কথা  বলতে  গেলে  বলতে  হয়,  অপারেশনে  টিউমার  এবং  ক্যান্সারের  উন্নতি  না  হয়ে  বরং  আরো  খারাপের  দিকে  চলে  যায়। 

 

 

 

            একজন  শিশু  বিশেষজ্ঞের (pediatriacian)  কথা  আমার  মনে  আছে  যার  গালে  টিউমার  হয়েছিল।  ফলে  অপারেশন  করে  টিউমার  কেটে  ফেলে  দেওয়ার  ছয়মাস  পরে  গালে  ক্যান্সার  ধরা  পড়ে।  এবার  ক্যান্সারসহ  গাল  কেটে  ফেলে  দেওয়ার  ছয়মাস  পরেই  চোয়ালের  হাড়ে  ক্যান্সার  দেখা  দেয়  এবং  আবার  অপারেশন  করে  একপাশের  সব  দাঁতসহ  চোয়াল  কেটে  ফেলে  দেওয়া  হয়।   ফলে  এক  বছরের  মধ্যে  তিন  তিনটি  অপারেশনের  ধাক্কায়  তার  স্বাস্থ্য  এতোই  ভেঙে  পড়ে  যে,  টিউমার  দেখা  দেওয়ার  দেড়  বছরের  মধ্যে  তার  মৃত্যু  হয়।  অথচ  অপারেশন  না  করে  ভদ্রলোক  যদি  বিনা  চিকিৎসায়ও  থাকতেন,  তথাপি  এর  চাইতে  অনেক  বেশী  দিন  বাঁচতেন।  অপারেশনের  পরে  হাসপাতালের  বেডে  যেই  নারকীয়  কষ্ট  ভোগ  করেছেন,  তা  না  হয়  বাদই  দিলাম (তিন  মাস  তো  কেবল  স্যুপ  আর  জুস  খেয়ে  বেঁচেছিলেন,  তাও  গলা  ছিদ্র  করে  ঢুকানো  রাবারের  পাইপ  দিয়ে !)।  হ্যাঁ,  সার্জনরা  অনেক  সময়  অজ্ঞতার  কারণে  অথবা  টাকার  লোভে  অনাকাঙ্খিত  অপারেশনের  মাধ্যমে  ক্যান্সার  রোগীদের  মৃত্যুকে  তরান্বিত  করে  থাকেন।  বহুল  প্রচলিত  এলোপ্যাথিক  চিকিৎসা  পদ্ধতিতে  ক্যানসারের  চিকিৎসা  করা  হয়  কেমোথেরাপি,  অপারেশন  এবং  রেডিয়েশন  দিয়ে।  তার  মধ্যে  সবচেয়ে  বেশী  ব্যবহৃত  হয়ে  থাকে  কেমোথেরাপি।  অথচ  নিরপেক্ষ  চিকিৎসা  বিজ্ঞানীদের  মতে,  এসব  পদ্ধতিতে  ক্যানসারের  রোগীদের  কোন  উপকার  হওয়ার  কোন  প্রমাণ  পাওয়া  যায়  নাই।  বরং  এগুলো  ক্যানসার  রোগীদের  শরীরকে  এবং  জন্মগত  রোগ  প্রতিরোধ  শক্তিকে (immune  system)  দুর্বল  করার  মাধ্যমে  ক্যানসারেরই  উপকার  করে  এবং  রোগীর  ড়্গতি  করে  থাকে।  এভাবে  এসব  অপচিকিৎসা  ক্যানসার  রোগীর  মৃত্যুকে  আরো  কাছে  টেনে  আনে।  ফ্রান্সের  একজন  ক্যানসার  গবেষক  বিজ্ঞানী  প্রফেসর  জর্জ  ম্যাথি (Dr.  George  Mathé)  বলেন  যে,  “যদি  আমি  ক্যানসারে  আক্রান্ত  হই,  তবে  আমি  কখনও  এসব  (কেমোথেরাপি,  রেডিয়েশন,  অপারেশন  ইত্যাদি)  চিকিৎসা  গ্রহন  করব  না।  কেননা  যে-সব  ক্যানসার  রোগী  এসব (কু)  চিকিৎসা  থেকে  অনেক  অনেক  দূরে  থাকতে  পারেন,  একমাত্র  তাদেরই  বাঁচার  আশা  আছে”। 

 

            সে  যাক,  হোমিওপ্যাথিতে  টিউমার  এবং  ক্যান্সারের  চিকিৎসায়  অনেকটা  বিপ্লবের  সূচনা  করেন  ব্রিটিশ  হোমিও  চিকিৎসাবিজ্ঞানী  ডাঃ  জে.  সি.  বার্নেট  (এম.ডি.)।  ১৮৭০  থেকে  ১৯০১  সাল  পর্যন্ত  ঔষধে  টিউমার  এবং  ক্যান্সার  নির্মুলকারী  হিসেবে  সারা  দুনিয়ায়  তাঁর  খ্যাতি  ছড়িয়ে  পড়েছিল।  হোমিওপ্যাথিতে  প্রচলিত  টিউমার/ ক্যানসারের  ঔষধগুলোর  বেশীর  ভাগই  বার্নেট  আবিষ্কার  করেন  এবং  ক্যানসারের  এসব  ভয়ঙ্কর  ভয়ঙ্কর  ঔষধ  তাঁর  নিজের  শরীরে  পরীক্ষা-নিরীক্ষা  করার  কারণে  অল্প  বয়সেই  তিনি  হার্ট  এটাকে  মৃত্যুবরণ  করেন।  বার্নেট  তাঁর  দীর্ঘ  গবেষণায়  প্রমাণ  করেছিলেন  যে,  টিউমার  এবং  ক্যান্সারের  একটি  বড়  কারণ  হলো  টিকা  বা  ভ্যাকসিনের (vaccine)  পার্শ্বপ্রতিক্রিয়া।  তিনিই  প্রথম  আবিষ্কার  করেন  যে,  থুজা (Thuja  occidentalis)  নামক  হোমিও  ঔষধটি  টিকার  প্রতিক্রিয়ায়  সৃষ্ট  অধিকাংশ  রোগ  দূর  করতে  সক্ষম।  তিনি  সব  সময়   বলতেন  যে,  “ছোট  হাতে  টিউমার  এবং  ক্যান্সার  নিরাময়  করা  সম্ভব  নয় ;  এজন্য  বড়  হাত  লাগবে”।  অর্থাৎ  সাধারণ  হোমিও  ডাক্তারদের  দ্বারা  টিউমার  এবং  ক্যান্সারের  চিকিৎসা  সফল  হয়  না  বরং  হোমিওপ্যাথিক  চিকিৎসা  বিজ্ঞানে  প্রচণ্ড  দক্ষতা  আছে  এমন  ডাক্তার  প্রয়োজন।  টিউমার  এবং  ক্যান্সারের  চিকিৎসায়  তিনি  একটি  বিশেষ  পদ্ধতি  প্রবর্তন  করেন  যাকে  মই  বা  লেডার  পদ্ধতি (Ladder  system)  নামে  অভিহিত  করতেন।  অর্থাৎ  অনেক  উপরে  উঠতে  যেমন  আমাদের  মইয়ের  অনেকগুলো  ধাপ  ডিঙাতে  হয়,  তেমনি  টিউমার  এবং  ক্যান্সারের  মতো  মারাত্মক  জটিল  রোগের  চিকিৎসাতেও  লক্ষণ  অনুযায়ী  একে  একে  অনেকগুলো  ঔষধের  সাহায্য  নিতে  হয়।  এবার  আসা  যাক  ক্যানসার  নিয়ে  গবেষণার  বিষয়ে।  দুইবার  নোবেল  পুরষ্কার  বিজয়ী  বিজ্ঞানী  লিনাস  পওলিঙের (Linus  Pauling, phd) মতে,  “প্রত্যেকেরই  জানা  উচিত  যে,  অধিকাংশ  ক্যান্সার  গবেষণা  চরম  ধোঁকাবাজি  ছাড়া  কিছুই  নয়  এবং  বেশীর  ভাগ  ক্যানসার  গবেষণা  প্রতিষ্টান  তাদের  (আর্থিকভাবে)  সাহায্যকারীদের  চাটুকারিতা  নিয়ে  ব্যস্ত”।  বলা  যায়,  ক্যান্সারের  নামে  গবেষণা  বর্তমানে  সবচেয়ে  লাভজনক  ব্যবসা।  গত  পঞ্চাশ  বছরে  এসব  গবেষণা  প্রতিষ্টান  বিভিন্ন  ব্যক্তি,  সংগঠন,  ঔষধ  কোম্পানি  এবং  রাষ্ট্রের  নিকট  থেকে  বিলিয়নকে  বিলিয়ন  ডলার  সাহায্য  পেয়েছে।  কিন্তু  প্রায়  এক  শতাব্দি  পেরিয়ে  গেলেও  এসব  গবেষণা  প্রতিষ্টান  ক্যানসারের  প্রকৃত  চিকিৎসা  আবিষ্কারের  ক্ষেত্রে  বিন্দুমাত্র  অগ্রগতি  দেখাতে  পারে  নাই।  গত  একশ  বছর  যাবতই  মানুষকে  শোনানো  হচ্ছে  যে,  বিজ্ঞানীরা  ক্যানসারের  কার্যকর  চিকিৎসা  আবিষ্কারের  একেবারে  কাছাকাছি  চলে  এসেছেন !  একেবারে  নাকের  ডগায় !!  কিন্তু  শেষ  পরযন্ত  এটি  গাধাকে  মুলা  দেখানোর  মতোই  রয়ে  গেছে।  অথচ  যতই  দিন  যাচ্ছে,  ক্যানসারের  আক্রমণ  ক্রমাগতভাবে  আশংকাজনক  হারে  ততই  বৃদ্ধি  পাচ্ছে।  পরিসংখ্যানে  দেখা  গেছে  যে,  ১৯৪০  সালে  অস্ট্রেলিয়ার  যেখানে  ১২%  মানুষ  ক্যান্সারের  মৃত্যুবরণ  করত,  সেখানে  ১৯৯২  সালে  তা  বৃদ্ধি  পেয়ে  ২৫.৯%-এ  দাঁড়িয়েছে।

 

            বিশেষজ্ঞদের  মতে,  কেমোথেরাপির  নামে  যে-সব  ঔষধ  ক্যানসার  রোগীদের  শরীরে  ইনজেকশান  দিয়ে  ঢুকানো  হয়,  এমন  জঘন্য-ধ্বংসাত্মক-ক্ষতিকর  পদার্থ  ইতিপূর্বে  কখনও  ঔষধের  নামে  মানুষের  শরীরে  প্রয়োগ  করা  হয়  নাই।  তারপরও  যদি  এসব  ঔষধ  টিউমার/ ক্যানসার  নির্মূলে  কোন  ভূমিকা  রাখার  প্রমাণ  থাকত,  তবু  কোন  কথা  ছিল  না।  কোন  ঔষধ  ল্যাবরেটরীতে  টেস্ট  টিউবের  টিউমারের  ওপর  কাজ  করলেই  তা  যে  মানুষের  শরীরের  টিউমার/ ক্যানসারের  ওপর  একইভাবে  কাজ  করবে  তা  সঠিক  নয়।  কেননা  টেস্ট  টিউবের  বিচ্ছিন্ন  (পশুদের)  টিউমার  আর  মানুষের  শরীরের  জীবন্ত  টিউমার  দুটি  সম্পূর্ণ  ভিন্ন  জিনিস।  বস্তুতপক্ষে  এমন  অনেক  ব্যবহারয্য  পদার্থ  আছে  যা  মানুষের  শরীরে  ক্যানসার  সৃষ্টি  করে  কিন্তু  পশুদের  ওপর  পরীক্ষা-নিরীক্ষা  করে  তাকে  নিরাপদ  ঘোষণা  করা  হয়েছে।  জার্মানীর  ক্যানসার  গবেষক  বিজ্ঞানী  ডাঃ  ওয়ার্নার  হার্টিনজারের (Dr.  Werner  Hartinger)  মতে,  “মানুষের  শরীরে  ক্যানসার  সৃষ্টিকারী  অনেক  ঔষধ  এবং  পেট্রো-কেমিক্যাল  সামগ্রির  ব্যবহারকে  বৈধ  করে  নেওয়া  হয়েছে……….এসব  বিভ্রান্তিকর  পশু  পরীক্ষার (animal  experiments)  মাধ্যমে………যা  ভোক্তাদের  মনে  নিরাপত্তার  মিথ্যা  আশ্বাস  জন্মিয়ে  দিয়েছে”।  সমপ্রতি  ডার  স্পিগল (Der  Spiegel)  নামের  বিখ্যাত  জার্মান  ম্যাগাজিনে  কেমোথেরাপির  তীব্র  সমালোচনা  করে  একটি  গবেষণা  রিপোর্ট  প্রকাশিত  হয়,  যাতে  কেমোথেরাপিকে  “অপ্রয়োজনীয়  বিষাক্ত  চিকিৎসা (Useless  Poisonous  Cures)”  হিসাবে  অভিহিত  করা  হয়েছে।  জার্মানীর  ডাসেলডরফ  সরকারী  হাসপাতালের  স্ত্রীরোগ  বিভাগের  ডাইরেক্টর  ডাঃ  ওলফ্রেম  জেগারের (Dr.  Wolfram  Jaeger, MD)  অভিজ্ঞতা  হলো,  “(স্তন  টিউমার  এবং  স্তন  ক্যান্সারের  চিকিৎসায়)  কেমোথেরাপি  দিয়ে  অতীতেও  সফলতা  পাওয়া  যায়নি  এবং  বর্তমানেও  পাওয়া  যায়  না।  বিগত  পঞ্চাশ  বছরে  কোটি  কোটি  মহিলাকে  এই  চিকিৎসা  দেওয়া  হয়েছে,  কিন্তু  এতে  উপকার  হওয়ার  কোন  প্রমাণ  ছাড়াই।  এসব  কথা  যদি  আমরা  রোগীদেরকে  বলি,  তবে  তাদের  মন  ভেঙে  চৌচির  হয়ে  যাবে”।  কানাডার  ম্যাকগিল  ইউনিভার্সিটি’র  ক্যানসার  সেন্টারের  ৭৯  জন  ক্যানসার  বিশেষজ্ঞের  মধ্যে  ৫৮  জনই  বলেছেন  যে,  “আমরা  কেমোথেরাপি  চিকিৎসা  প্রত্যাখান  যোগ্য  মনে  করি।  কেন ?  কারণ  কেমোথেরাপির  অকার্যকারিতা  এবং  ইহার  বিষক্রিয়ার  মাত্রাধিক্য”।  কেমোথেরাপি  ব্যবহারের  হার  যত  বৃদ্ধি  পাচ্ছে,  ক্যানসার  রোগীদের  মৃত্যুর  হারও  তত  বাড়তেছে।  কোন  কোন  গবেষণায়  বিজ্ঞানীরা  লক্ষ্য  করেছেন  যে,  মাত্র  ২%  থেকে  ৪%  টিউমারের  ক্ষেত্রে  কেমোথেরাপি  কাজ  উপকার  করে  থাকে।  অর্থাৎ  ৯৬  থেকে  ৯৮  ভাগ  ক্ষেত্রেই  কেমোথেরাপি  কোন  কাজ  করে  না।  আমেরিকান  কংগ্রেসে  সাক্ষ্যদান  কালে  ক্যানসার  গবেষক  ডাঃ  স্যামুয়েল  এপ্সটেইন (Dr.  Samuel  S.  Epstein)  বলেছিলেন  যে,  “কেমোথেরাপি  ও  রেডিয়েশন  রোগীদের  মধ্যে  দ্বিতীয়বার  ক্যানসার  হওয়ার  ঝুঁকি  বাড়িয়ে  দিতে  পারে  শতকরা  ১০০  ভাগ”।  কেমোথেরাপির  ওপর  পৃথিবীতে  আজ  পর্যন্ত  গবেষণা  হয়েছে  তার  সবকিছু  বিশ্লেষণ  করে  জার্মানীর  হাইডেলবার্গের  টিউমার  ক্লিনিকের  বিজ্ঞানী  ডাঃ  উলরিক  এবেল (Dr.  Ulrich  Abel)  কেমোথেরাপিকে  অভিহিত  করেন  “একটি  বৈজ্ঞানিক  ধ্বংসস্তুপ” (a  scientific  wasteland)  হিসাবে।  তাঁর  মতে,  কেমোথেরাপি  হলো  “রাজার  নতুন  পোষাক  পড়া”র  মতো।  অর্থাৎ  পোষাক  পড়েও  উলঙ্গ  থাকা ;  বাঁচার  আশায়  চিকিৎসা  নিয়ে  উল্টো  অকালে  মৃত্যুবরণ  করা।  কেমোথেরাপিতে  যদি  কোন  উপকার  না  হয়,  তবে  বিগত  ৫০  বছরে  কোটি  কোটি  ক্যানসার  রোগীকে  কেমোথেরাপি  চিকিৎসা  দেওয়া  হলো ;  এটি  কিভাবে  সম্ভব ?  আসলে  এতে  তিন  পক্ষই  খুশী।  রোগীরা  খুশী  তারা  দামী (এবং  দামী  মানেই  নিশ্চয়  উপকারী ?)  একটি  চিকিৎসা  নিতে  পারছেন,  ডাক্তাররা  খুশী  তারা  রোগীদেরকে  খালি  হাতে  ফিরিয়ে  দেওয়ার  পরিবর্তে  কিছু  একটা  চিকিৎসা  দিতে  পারছেন  এবং  ঔষধ  কোমপানীরাও  খুশী  (রোগীরা  জাহান্নামে  গেলেও)  তাদের  ব্যাংক-ব্যালেন্স  ঠিকই  দিনদিন  ফুলে  উঠতেছে । 

 

            বিজ্ঞানীরা  ক্যানসারের  প্রকৃত  চিকিৎসা  আবিষ্কার  করতে  পারছেন  না  কেন ?  গত  একশ  বছরে  হাজার  হাজার  চিকিৎসা  বিজ্ঞানী  এবং  শত  শত  ক্যানসার  গবেষণা  প্রতিষ্টানের  পরিশ্রম  কেন  বিফলে  যাচ্ছে ?  ১৯৭০  সালে  ক্যান্সার  গবেষক,  ক্যানসার  গবেষণা  প্রতিষ্টানসমূহ,  ক্যানসারের  চিকিৎসায়  নিয়োজিত  হাসপাতাল-ক্লিনিকগুলো,  ক্যানসারের  (কেমোথেরাপিউটিক)  ঔষধ  এবং  রেডিয়েশান  উৎপাদনকারী  কোম্পানীসমূহ  ইত্যাদির  কার্যক্রম,  নীতিমালা  এবং  সম্পদের  ওপর  ব্যাপক  অনুসন্ধান  করে  রবার্ট  হিউষ্টন (Robert  Houston)  এবং  গ্যারি  নাল (Gary  null)  নামক  দুজন  মার্কিন  সাংবাদিক  পত্রিকায়  রিপোর্ট  করেন  যে,  এদের  সকলের  সম্মিলিত  চক্রান্তের  কারণেই  ক্যানসারের  কোন  কার্যকর  চিকিৎসা  আবিষ্কার  এবং  প্রচলন  করা  সম্ভব  হচ্ছে  না।  কারণ  ক্যানসারের  কার্যকর  চিকিৎসা  আবিষ্কৃত  হয়ে  গেলে  এসব  ক্যান্সার  গবেষক  বিজ্ঞানীদের  চাকুরি  চলে  যাবে,  মোটা  আয়-রোজগার-পদ-পদবী-ক্ষমতা-প্রতিপত্তি  ইত্যাদি  বন্ধ  হয়ে  যাবে  এবং  ক্যানসার  গবেষণার  নামে  নানা  রকমের  ছাতা-মাথা  আবিষ্কার  করে  বড়  বড়  দামী  দামী  পুরষ্কার / গোল্ডমেডেল  আর  জুটবে  না।  ক্যানসার  গবেষণায়  নিয়োজিত  এসব  প্রতিষ্ঠান  প্রতি  বছর  বিভিন্ন  ব্যক্তি,  ঔষধ  কোম্পানী,  বিভিন্ন  দেশের  সরকার,  এমনকি  জাতিসংঘের  কাছ  থেকেও  বিলিয়ন  বিলিয়ন  ডলার  সাহায্য (donation)  পেয়ে  থাকে।  ক্যানসার  গবেষক  এবং  দৈত্যাকার  ক্যান্সার  গবেষণা  প্রতিষ্ঠানসমূহের  প্রধান  দাতা  হলো  এসব  কেমোথেরাপি  ঔষধ  উৎপাদনকারী  বহুজাতিক  ঔষধ  কোম্পানিগুলো।  ক্যানসারের  প্রচলিত  চিকিৎসা  অত্যন্ত  ব্যয়বহুল  হলেও  খুবই  সামান্য  খরচে  মানুষকে  সচেতন  করার  মাধ্যমে  ক্যানসার  প্রতিরোধ  করা  যায়।  কিন্তু  ক্যানসার  প্রতিরোধের  ক্ষেত্রে  এসব  বিজ্ঞানীদের  কিংবা  দৈত্যাকার  ক্যানসার  গবেষণা  প্রতিষ্টানগুলোর  কোন  আগ্রহ  নাই।  ডাঃ  রবার্ট  শার্পের (Dr.  Robert  Sharpe)  মতে,  “……প্রচলিত  মেডিক্যাল  সংষ্কৃতিতে  রোগের  চিকিৎসা  বিপুল  লাভজনক  কিন্তু  রোগ  প্রতিরোধ  তেমনটা  (লাভজনক)  নয়।  ১৯৮৫  সালে  আমেরিকা,  ইউরোপ  এবং  জাপানে  সম্মিলিতভাবে  ক্যানসারের  কেমোথেরাপিউটিক  ঔষধ  এবং  অন্যান্য  সেবার (?)  বার্ষিক  বিক্রির  পরিমাণ  ছিল  ৩.২  বিলিয়ন  পাউন্ড  এবং  প্রতি  বছর  তা  নিশ্চিতভাবেই  ১০%  হারে  বৃদ্ধি  পাচ্ছে।  কিন্তু  ক্যানসার  প্রতিরোধ  কার্যক্রমে  একমাত্র  রোগীদের  ছাড়া  অন্য  কারো  লাভ  হয়  না।  অথচ  ঔষধ  কোম্পানীগুলোর  নীতি  হলো  যে-কোন  ছুতায়  মানুষকে  ঔষধ  খাওয়াতে  হবে (pill  for  every  ill)”।  কাজেই  ঔষধ  কোম্পানীগুলো  এতো  বোকা  নয়  যে,  তাদের  ব্যবসার  ক্ষতি  হয়  এমন  গবেষকদের  কিংবা  গবেষণা  প্রতিষ্টানের  পেছনে  তারা  বিলিয়ন  বিলিয়ন  ডলার  খরচ  করবে।  ঔষধ  কোম্পানীর  দালাল  এসব  ক্যানসার  গবেষকরা  এবং  ক্যানসার  গবেষণা  প্রতিষ্ঠানগুলো  কেবল  ক্যানসারের  সহজ  চিকিৎসা  আবিষ্কারের  সকল  রাস্তা  বন্ধ  করেই  রাখে  নাই ;  সাথে  সাথে  যারা  ক্যানসারের  প্রকৃত  চিকিৎসা  আবিষ্কার  করতে  সক্ষম  হয়,  তাদেরকে  নির্মূল  করার  জন্য  এরা  সর্বশক্তি  নিয়ে  ঝাপিয়ে  পড়ে।  হোমিও  চিকিৎসা  বিজ্ঞানীরা  আজ  থেকে  দুইশত  বছর  পূর্বেই  ক্যানসারের  প্রকৃত  চিকিৎসা  আবিষ্কার  করতে  সক্ষম  হয় ;  কিন্তু  ঔষধ  কোম্পানীর  এই  দালালরা  তখন  থেকেই  হোমিওপ্যাথিকে  “অবৈজ্ঞানিক  চিকিৎসা”,  “ভূয়া  চিকিৎসা”,  “হাতুড়ে  চিকিৎসা”  ইত্যাদি  নানাভাবে  গালাগালি  করে  মানুষকে  বিভ্রান্ত  করে  আসছে।  অপপ্রচারের  পাশাপাশি  গত  দুইশ  বছরে  তারা  তাদের  সরকারী,  সাংগঠনিক  এবং  অথনৈতিক  ক্ষমতা  ব্যবহার  করে  হোমিওপ্যাথিকে  সারা  দুনিয়া  থেকে  কয়েকবার  ধ্বংস  করেছে  কিন্তু  জনপ্রিয়তার  কারণে  হোমিওপ্যাথি  প্রতিবারই  ধ্বংসস্তুপ  থেকে  আবার  গা  ঝারা  দিয়ে  উঠে  দাঁড়িয়েছে।  শুধু  হোমিওপ্যাথি-ই  নয়  বরং  অন্য  যে-কেউও  যদি  ক্যানসারের  চিকিৎসা  আবিষ্কারের  মাধ্যমে  অথবা  অন্য  কোনভাবে  এসব  বাঘা  বাঘা  ঔষধ  কোম্পানীগুলোর  ব্যবসায়িক  স্বার্থে  ব্যাঘাত  ঘটায়,  তাহলেই  এই  শয়তানী  চক্র (evil  industry)  তাকে  বিনাশ  করার  জন্য  সর্বশক্তি  নিয়োগ  করে  চেষ্ঠা  চালাতে  থাকে।

 

 

            হোমিও  চিকিৎসা  বিজ্ঞানীদের  মতে,  আমাদের  জীবনী  শক্তি  বিকৃত (deviate)  হলেই  শরীর  ও  মনে  নানারকম  রোগের  উৎপত্তি  হয়।  জীবনী  শক্তি  তার  স্বাভাবিক  পথ  থেকে  লাইনচ্যুত (out  of  track)  হলেই  শরীর  এবং  মনে  ধ্বংসাত্মক (destructive)  ক্রিয়াকলাপের  সূচনা  হয়।  যেমন  টিউমারের  সৃষ্টি  হওয়া (neoplasm),  পাথর  তৈরী  হওয়া (calculus),  ব্যাকটেরিয়া-ভাইরাসের  আক্রমণ (germ  infection),  কোন  অঙ্গ  সরু  হওয়া (atrophy),  কোন  অঙ্গ  মোটা  হওয়া  বা  ফুলে  যাওয়া (hypertrophy)  ইত্যাদি  ইত্যাদি।  পরবর্তীতে  ঔষধের  মাধ্যমে  যদি  আমরা  জীবনী  শক্তিকে  সঠিক  পথে  ফিরিয়ে (back  to  the  track)  আনতে  পারি,  তবে  শরীর  ও  মনে  আবার  বিপরীতমুখী  ক্রিয়ার (reverse  action),  মেরামতকরণ (reconstruction)  ক্রিয়া  আরম্ভ  হয়।  আমাদের  শরীর  তখন  নিজেই  টিউমারকে  শোষণ (absorb)  করে  নেয়,  পাথরকে  গলিয়ে (dissolve)  বের  করে  দেয়,  জীবাণুকে  তাড়িয়ে  দেয়,  সরু  এবং  ফুলা  অঙ্গকে  স্বাভাবিক  করে  দেয়  ইত্যাদি  ইত্যাদি।  এভাবে  ঔষধ  প্রয়োগে  জীবনীশক্তিকে  উজ্জীবিত  করার  মাধ্যমে  শরীরের  নিজস্ব  রোগ  নিরাময়  ক্ষমতাকে  ব্যবহার  রোগমুক্তি  অর্জন  করাই  হলো  প্রাকৃতিক (natural)  এবং  সঠিক  পদ্ধতি।  আমাদেরকে  বুঝতে  হবে  যে,  টিউমার/ ক্যান্সার  একটি  নির্দিষ্ট  স্থানে / অঙ্গে  দেখা  দিলেও  এটি  কোন  স্থানিক  রোগ (Local)  নয় ;  বরং  এটি  সামগ্রিক  দৈহিক (systemic)  রোগ।  এগুলো  এক  জায়গায়  দেখা  দিলেও  এদের  শিকড়  থাকে  অন্য  জায়গায় ।  কাজেই  অপারেশন (surgery),  কেমোথেরাপি (chemotherapy),  রেডিয়েশন (radiotherapy)  ইত্যাদির  মাধ্যমে  ক্যান্সার  নির্মূল  করা  সম্ভব  নয়।  কেটে-কুটে,  রেডিয়েশন  দিয়ে,  কেমোথেরাপি  দিয়ে  এক  জায়গা  থেকে  বিদায়  করা  গেলেও  কদিন  পর  সেটি  অন্য  (আরো  নাজুক)  জায়গায়  গিয়ে  আবার  দেখা  দিবেই।  ক্যান্সার-টিউমারের  দৃষ্টানত্ম  হলো  অনেকটা  আম  গাছের  মতো।  আম  কেটে-কুটে  যতই  পরিষ্কার  করম্নন  না  কেন,  তাতে  কিছু  দিন  পরপর  আম  ধরতেই  থাকবে।  যতদিন  না  আপনি  আম  গাছকে  শিকড়সহ  উৎপাটন  না  করছেন।  আর  ক্যান্সারের  শিকড়  হলো  এলোপ্যাথিক  ঔষধ  এবং  টিকা (vaccine)।  নিরপেক্ষ  চিকিৎসা  বিজ্ঞানীদের  মতে,  “ক্যান্সার  কোন  জন্মগত  বা  বংশগত  রোগ  নয় ;  বরং  এটি  পুরোপুরি  ঔষধের (এবং  টিকার)  বিষক্রিয়াজনিত  সৃষ্ট  রোগ”।  যেহেতু  যে-কোন  রোগের  এলোপ্যাথিক  চিকিৎসা  করালে  প্রচুর  ঔষধ  খেতে  হয়,  তাই  বলা  যায়  ক্যান্সার  হলো  এলোপ্যাথিক  ঔষধ-টিকার  দ্বারা  সৃষ্ট  একটি  রোগ।  আর  এলোপ্যাথিক  ঔষধ  এবং  টিকার  বিষক্রিয়া  নষ্ট  করার  ক্ষমতা  একমাত্র  হোমিও  ঔষধেরই  আছে। 

 

            চিকিৎসা  বিজ্ঞানীদের  মতে,  পৃথিবীতে  একবার  যে  জন্ম  নিয়েছে,  তার  ক্যান্সার  হওয়ার  ঝুঁকি  থেকে  কোন  মুক্তি  নেই।  কিন্তু  হোমিও  চিকিৎসা  বিজ্ঞানীরা  দাবী  করেন  যে,  যেই  পরিবারের  লোকেরা  তিন  পুরুষ  পর্যন্ত  হোমিও  চিকিৎসা  ব্যতীত  অন্যান্য  চিকিৎসা  বর্জন  করা  করে  চলবে,  সেই  পরিবারের  লোকেরা  ক্যান্সার  থেকে  মুক্ত  থাকবে।  হোমিও  চিকিৎসা  বিজ্ঞানীদের  মতে,  লো  ব্লাড  প্রেসারের (hypotension)  রোগীরা  সাধারণত  যক্ষ্মায় (tuberculosis)  আক্রান্ত  হয়  এবং  হাই  ব্লাড  প্রেসারের (hypertension)  রোগীরা  সাধারণত  ক্যানসারে  আক্রান্ত  হয়ে  থাকে।  প্রচলিত  ক্যান্সার  সনাক্তকরণ (diagnosis)  প্রদ্ধতিতেও  আছে  অনেক  ভয়ঙ্কর  বিপদ ।  একটি  গবেষণায়  দেখানো  হয়েছে  যে,  শতকরা  ৪০  ভাগ  ক্ষেত্রে  থাইরয়েড (thyroid),  প্যানক্রিয়াস (pancreas) এবং  প্রোস্টেট (prostate)  ক্যান্সার  ধরা  পড়ে  রোগীর  মৃত্যুর  পরে  পোষ্ট-মর্টেম  বা  ময়নাতদন্তের (autopsy)  সময়।  অর্থাৎ  দেখা  যায়  রোগী  এসব  অঙ্গের  ক্যান্সারে  আক্রান্ত  ছিল  অথচ  ক্যান্সারের  কোন  লক্ষণ  প্রকাশ  পায়  নাই  বিধায়  কোন  রকম  চিকিৎসা  ছাড়াই  রোগীরা  দীর্ঘদিন  সুস্থ  জীবনযাপন  করেছেন।  এসব  ক্যান্সারে  তাদের  মৃত্যু  হয়  নাই।  বয়স  ৭৫  হলে  প্রায়  ৫০%  পুরুষরাই  প্রোস্টেট  ক্যান্সারে  আক্রান্ত  হয়ে  থাকে।  কিন্তু  এদের  মাত্র  ১%  এই  রোগে  মৃত্যুবরণ  করে।  আর  বাকীরা  বিনা  চিকিৎসায়  যুগের  পর  যুগ  সুস’  থাকে  কিভাবে ?  হ্যাঁ,  জন্মগতভাবে  প্রাপ্ত  আমাদের  স্বাভাবিক  রোগ  প্রতিরোধ  শক্তিই (immune  system)  ক্যান্সারসহ  সমস্ত  রোগকে  সামাল  দিয়ে  রাখার  ক্ষমতা  রাখে।  ক্যান্সার  নির্ণয়ের  একটি  বহুল  ব্যবহৃত  পরীক্ষা  পদ্ধতির  নাম  হলো  বায়োপসী (biopsy),  যাতে  টিউমারের  ভেতরে  সুই  ঢুকিয়ে  কিছু  মাংস  ছিড়ে  এনে  মাইক্রোষ্কোপের  নীচে  রেখে  পরীক্ষা  করা  হয়,  তাতে  ক্যান্সার  কোষ  আছে  কিনা।  কিন্তু  সমপ্রতি  বিজ্ঞানীরা  প্রমাণ  পেয়েছেন  যে,  এভাবে  টিউমারকে  ছিদ্র  করার  কারণে  সেই  ছিদ্র  দিয়ে  ক্যান্সার  কোষ  বেরিয়ে  দ্রুত  সারা  শরীরে  ছড়িয়ে  পড়ে (metastasis)।  তখন  ক্যানসার  রোগীর  অবস্থা  শোচনীয়  হয়ে  যায়  এবং  তাদেরকে  বাচাঁনো  অসম্ভব  হয়ে  পড়ে।  কেননা  টিউমারগুলো  আসলে  ক্যান্সার  নামক  এই  ভয়ঙ্কর  বিষাক্ত  পদার্থকে  চারদিক  থেকে  গ্রেফতার  করে,  বন্দি  করে  রাখে।  ফলে  ইহারা  সহজে  সারা  শরীরে  ছড়াতে  পারে  না।  কিন্তু  পরীক্ষা-নিরীক্ষার  নামে  ছিদ্র  করে  তাদেরকে  ছড়িয়ে  পড়ার  সুযোগ  করে  দেওয়া  একটি  জঘন্য  মূর্খতাসুলভ  কাজ।

 

            আপনি  হয়ত  ভাবতে  পারেন,  চিকিৎসা  বিজ্ঞানে  আবার  অজ্ঞতা-মূর্খতা  চলে  কিভাবে ?  হ্যাঁ,  নিরপেক্ষ  গবেষকদের  মতে,  প্রচলিত  চিকিৎসা  বিজ্ঞান  হলো  বিজ্ঞানের  নামে  প্রচলিত  নানান  রকমের  অজ্ঞতা-মূর্খতা-নির্বুদ্ধিতার  একটি  সবচেয়ে  বড়  আখড়া।  কথায়  বলে,  বাস্তব  সত্য  এতই  অদভূত  যে  তা  রূপকথাকেও  হার  মানায়।  প্রখ্যাত  চিকিৎসক  ডাঃ  এলেন  গ্রীনবার্গ (Dr.  Allan  Greenberg, M.D.)  বলেন  যে,  “একজন  অবসরপ্রাপ্ত  চিকিৎসক  হিসেবে  আমি  সততার  সাথে  বলতে  পারি  যে,  আপনি  একশ  বছর  বাঁচতে  পারবেন  যদি  ডাক্তারদের  নিকট  এবং  হাসপাতালে  যাওয়া  বাদ  দিয়ে  চলতে  পারেন।  আর  সৌভাগ্যবশত  যদি  কোন  লতাপাতাপন’ী  ডাক্তারের  সন্ধ্যান  না  পেয়ে  থাকেন,  তবে  নিজেই  পুষ্টি  বিদ্যা  ও  লতাপাতার  ঔষধ  সমন্ধে  জ্ঞান  অর্জন   করে  নিন।  প্রায়  সমসত্ম  ঔষধই  বিষাক্ত (Toxic) এবং  তাদেরকে  তৈরী  করা  হয়েছে  কেবল  রোগের  লড়্গণ  দূর  করার  জন্য ;  কাউকে  রোগমুক্ত  করার  জন্য  নয়।  টিকাসমূহ (vaccine)  মারাত্মক  বিপজ্জনক ;  তাদের  কার্যকারিতা  নিয়ে  কখনও  যথেষ্ট  গবেষণা  করা  হয়  নাই।  অধিকাংশ  অপারেশনই  অপ্রয়োজনীয়  এবং  বেশীর  ভাগ  ডাক্তারী  বই  ত্রুটিপূর্ণ (inaccurate)  আর  প্রতারণামূলক (deceptive)।  প্রায়  সব  রোগের  কারণকেই  বলা  হয়  অজ্ঞাত (idiopathic)  এবং  বংশগত (genetic) ;  যদিও  তা  অসত্য  কথা।  সংক্ষেপে  বলা  যায়,  আমাদের  বহুল  প্রচলিত  এলোপ্যাথিক  চিকিৎসা  বিজ্ঞান  নৈরাশ্যজনকভাবে  কুৎসিত (inept) এবং  দুর্নীতিগ্রস্ত (corrupt)।  ক্যানসার  এবং  অন্যান্য  জটিল  রোগের  চিকিৎসা  একটি  জাতীয়  কলঙ্ক  স্বরূপ।  এই  বিষয়টি  যত  তাড়াতাড়ি  বুঝতে  পারবেন,  আপনার  জন্য  ততই  মঙ্গল”।  ক্যালিফোর্নিয়া  ইউনিভার্সিটি’র  ফিজিওলজীর  প্রফেসর  এবং  বিশ্বখ্যাত  ক্যান্সার  গবেষক  ডাঃ  হার্ডিন  জোনস,  তাঁর  সুদীর্ঘ  ২৩  বছরের  ক্যানসার  গবেষণার  অভিজ্ঞতার  ভিত্তিতে  বলেছেন  যে,  “আমার  গবেষনায়  এটি  চূড়ানত্মভাবে  প্রমাণিত  হয়েছে  যে,  যে-সব  ক্যানসার  রোগীরা  কেমোথেরাপি  এবং  রেডিয়েশান  থেরাপি  বর্জন  করেন,  তারা  এসব  চিকিৎসা  গ্রহনকারী  রোগীদের  চাইতে  চারগুণ  বেশী  আয়ু  লাভ  করে  থাকেন……….এতে  সন্দেহের  ছায়ামাত্র  নাই।  ক্যান্সারের  চিকিৎসায়  অপারেশন  উপকারের  চাইতে  ক্ষতিই  করে  বেশী।  রেডিয়েশান  অর্থাৎ  রেডিওথেরাপির (radiation)  ব্যাপারেও  একই  কথা  প্রযোজ্য ;  দেওয়া  আর  না  দেওয়ার  মধ্যে  তেমন  কোন  পার্থক্য  নাই। …….ক্যানসার  প্রথম  পর্যায়ে  ধরতে  পারলে  সহজে  সারিয়ে  দেওয়া  যায়  অথবা  রোগীর  আয়ু  বৃদ্ধি  পায়- এই  জাতীয়  চিন্তা  চরম  মূর্খতার  নামান্তর।  অধিকন্তু  কোন  রকমের  চিকিৎসা  না  নেওয়া  স্তন  ক্যান্সারের  রোগীরা  বরং  চিকিৎসা  নেওয়া  রোগীদের  চাইতে  চারগুণ  বেশী  আয়ু  পেয়ে  থাকেন।  আমার  স্ত্রীর  যদি  স্তন  ক্যানসার  ধরা  পড়ে,  তবে  সে  কি  করবে  তা  নিয়ে  আমি  তার  সাথে  আলোচনা  করেছি।  এবং  আমরা  দু’জনেই  একমত  হয়েছি  যে,  আমরা  চিকিৎসার  নামে  কিছুই  করব  না ;  কেবল  যথাসম্ভব  সুন্দরভাবে  জীবনযাপন  করা  ছাড়া।  আমি  গ্যারান্টি  দিয়ে  বলতে  পারি,  একমাত্র  এভাবেই  সে  সবচেয়ে  বেশী  দিন  বাচঁবে”।  ডঃ  রালফ  মস (Dr.  Ralph  Moss, Ph.D.)  একবার  বলেছিলেন  যে,  “বিকল্প  চিকিৎসা  পদ্ধতিগুলোকে  ব্যর্থ  প্রমাণ  করার  জন্য  (এলোপ্যাথিক)  ডাক্তাররা  কত  কিছুই  না  চালু  করেছেন,  ভাবলে  আশ্চর্য  হতে  হয়।  আবার  তাদের  ব্যর্থতা  শেষ  পর্যনত্ম  বিকল্প  চিকিৎসা  পদ্ধতিসমূহের  পক্ষেই  গেছে”। 

 

            স্তন  ক্যান্সার  নির্ণয়ের  জন্য  মেমোগ্রাফী (Mammography)  নামে  একটি  টেস্ট  করা  হয়,  যাতে  স্তনকে  একটি  যন্ত্রের  মাধ্যমে  চেপে  ধরে  বিভিন্ন  এংগেলে (angle)  কয়েকটি  এক্স-রে  করা  হয়।  এই  টেস্ট  করতে  যেহেতু  রেডিয়েশন (X-ray)  ব্যবহৃত  হয়,  তাই  এতে  ক্যান্সার  হওয়ার  ঝুঁকি  আছে  ষোলআনা।  পত্র-পত্রিকা-রেডিও-টিভিতে  প্রায়ই  বিজ্ঞাপন  দেওয়া  হয়  যে,  তাড়াতাড়ি  স্তন  ক্যান্সার  সনাক্ত (early  detection)  করার  জন্য  প্রতিটি  সচেতন  নারীর  উচিত  বছরে  একবার  করে  মেমোগ্রাফী  টেস্ট  করা।  অথচ  আপনি  যদি  দুই/চার  বার  মেমোগ্রাফী  করেন,  তবে  মেমোগ্রাফী  টেস্টের  কারণেই  বরং  আপনি  আরো  আগে  স্তন  ক্যান্সারে  আক্রান্ত  হবেন।  কেননা  রেডিয়েশানই (radiation)  হলো  ক্যানসারে  আক্রান্ত  হওয়ার  একটি  বহুল  প্রমাণিত  বড়  কারণ।  বলা  হয়ে  থাকে,  যখন  থেকে  চিকিৎসা  ক্ষেত্রে  এক্স-রে (X-ray)  চালু  হয়েছে,  তখন  থেকেই  ক্যান্সারের  হার  বৃদ্ধি  পেয়েছে  দ্রুতগতিতে।  এই  কারণে  ১৯৭৬  সালে  আমেরিকান  ক্যানসার  সোসাইটি  এবং  ন্যাশনাল  ক্যানসার  ইনিষ্টিটিউট  তাদের  এক  ঘোষণায়  অপ্রয়োজনে  মেমোগ্রাফী  টেস্ট  করাতে  সবাইকে  নিষেধ  করেছেন।  তাছাড়া  এই  মেমোগ্রাফী  টেস্ট  অধিকাংশ  ক্ষেত্রে  ভুয়া  রিপোর্ট  দিয়ে  থাকে।  ক্যানসার  না  থাকলে  বলবে  আছে  আবার  ক্যানসার  থাকলে  বলবে  নাই ;  অন্যদিকে  নরমাল  টিউমারকে  বলবে  ক্যানসার  এবং  ক্যানসারকে  বলবে  নরমাল  টিউমার।  ১৯৯৩  সালের  ২৬  মে  আমেরিকান  মেডিক্যাল  এসোসিয়েশনের  জার্নালে  প্রকাশিত  একটি  গবেষণায়  বলা  হয়েছে  যে,  মেমোগ্রাফী  টেস্টে  ২০%  থেকে  ৬৩%  ক্ষেত্রে  ভুল  রিপোর্ট  আসতে  পারে।  কাজেই  নিয়মিত  মেমোগ্রাফী  টেস্ট  করতে  বিজ্ঞাপন  দিয়ে  নারীদের  উৎসাহিত  করা  নেহায়েত  হাস্যকর  ধান্ধাবাজি  ছাড়া  আর  কিছুই  না।  অধিকাংশ  ডাক্তাররা  মহিলাদেরকে  তাদের  স্তনে  টিউমার/ ক্যানসার  হলো  কিনা  সে  বিষয়ে  সচেতন  করার  জন্য  কিছুদিন  পরপর  নিজেদের  স্তন  নিজেরাই  টিপে  টিপে  (তাতে  কোন  চাকা  আছে  কিনা)  পরীক্ষা  করার  জন্য  পরামর্শ  দিয়ে  থাকেন।  আসলে  এভাবে  রোগের  বিরুদ্ধে  সচেতনতা  সৃষ্টির  নামে  ডাক্তাররা  বরং  মানুষের  মধ্যে  ভীতির  সৃষ্টি  করেন  এবং  এতে  করে  স্তন  টিউমার/ ক্যানসারের  আক্রমণের  হার  আরো  বৃদ্ধি  পেয়ে  থাকে।  বাস্তবে  দেখা  গেছে,  টিভিতে  ব্লাড  প্রেসারের (hypertension) অনুষ্টান  দেখে  ভয়ের  চোটে  আরো  বেশী  বেশী  মানুষ  ব্লাড  প্রেসারে  আক্রান্ত  হচ্ছে।  হোমিও  চিকিৎসা  বিজ্ঞানীরা  ক্যানসারে  আক্রান্ত  রোগীদের  ওপর  গবেষণা  করে  দেখেছেন  যে,  অধিকাংশ  ক্যানসার  রোগীর  মনেই  ক্যানসারে  আক্রান্ত  হওয়ার  অনেক  বছর  পূর্ব  থেকেই  ক্যানসারের  প্রতি  একটি  ভয়  কাজ  করত।  এবং  এই  অস্বাভাবিক  ক্যানসার  ভীতি  তাদেরকে  শেষ  পর্যনত্ম  ক্যানসারের  শিকারে  পরিণত  করেছে।  কাজেই  আপনার  সত্মনে  যখন  টিউমার / ক্যানসার  হবে,  তখন  এটি  এমনিতেই  চোখে  পড়বে।  এজন্য  ভয়ে  ভয়ে  রোজ  রোজ  টিপে  টিপে  দেখার  কোন  প্রয়োজন  নাই।  একইভাবে  চিকিৎসা  বিষয়ক  যাবতীয়  বিজ্ঞাপন  থেকে  সযত্নে  একশ  মাইল  দূরে  থাকা  সকলেরই  উচিত  বলে  বিশেষজ্ঞরা  মনে  করেন। 

 

            আপনার  শরীরের  কোন  স্থানে  যদি  ক্যানসার  ধরা  পড়ে,  তবে  সবক্ষেত্রে  এটি  কোন  মারাত্মক  ঘটনা  নয়  কিংবা  এতে  অকালে  আপনার  প্রাণনাশেরও  আশংকা  নাই।  কিন্তু  ডাক্তাররা  এবং  ঔষধ  কোম্পানীসমূহ  তাদের  স্বার্থে  তারা  মানুষকে  ভীতি  প্রদর্শন  করতে  থাকে।  কেবল  খাদ্যভ্যাসের  পরিবর্তন (diet),  জীবনযাপন  পদ্ধতির (Life  style)  সংশোধন  এবং  মনমানসিকতার  পরিবর্তনের (emotional  state)  মাধ্যমে  বিনা  চিকিৎসায়  অগণিত  মানুষ  ক্যানসার  থেকে  মুক্তি  পেয়েছেন,  এমন  ঘটনা  ইন্টারনেটে  খোঁজলে  অনেক  দেখতে  পাবেন।  কলকারখানায়  তৈরী  খাবার (industrial  food),  চর্বি  জাতীয়  খাবার  বর্জন  করুন (animal  fat),  স্ত্রী-পুত্র-কন্যা-আত্মীয়-স্বজন-পাড়া-প্রতিবেশী  পরিবেষ্টিত  সহজ-সরল-সুন্দর  জীবন  যাপন  করুন,  সর্বদা  আল্লাহকে  স্মরণ  করুন,  নিয়মিত  নামাজ-রোজা-দান-খয়রাত  ইত্যাদি  ইবাদত-বন্দেগী  পালন  করে  চলুন,  শিশুদের  ভালোবাসুন,  বড়দের  সম্মান  করুন,  দরিদ্রদের  কল্যাণে  কাজ  করুন,  ফুল-পাখি-বৃক্ষ-তরুলতা-আকাশ-বাতাস-সাগর-নদী  ইত্যাদির  দিকে  তাকিয়ে  থেকে  নিজের  মনকে  সর্বদা  পবিত্র  রাখুন।  ক্যানসার  আপনার  ধারেকাছে  আসতে  পারবে  না।  আর  যদি  এসেও  থাকে,  মানে  মানে  কেটে  পড়বে।  আপনার  মনকে  যদি  প্রথমে  ক্যানসারমুক্ত  করতে  না  পারেন,  তবে  দুয়েক  মাস  বা  দুয়েক  বছর  ঔষধ  খেয়ে  কখনও  শরীরের  ক্যানসার  দূর  করতে  পারবেন  না।  এটা  একেবারেই  অবাস্তব  কল্পনা  এবং  প্রাকৃতিক  নিয়ম  বিরুদ্ধে।  প্রকৃতি  মুহূর্তের  মধ্যে  কিছু  ধ্বংসও  করে  না  আবার  চোখের  পলকে  কিছু  সৃষ্টিও  করে  না।  প্রকৃতি  তার  সকল  কাজই  করে  আস্তে-ধীরে,  রয়ে-সয়ে  দীর্ঘ  সময়  নিয়ে।  ডাঃ  লোরেইন  ডে (Dr.  Lorraine  Day,  M.D.)-এর  মতে,  “প্রচলিত  অন্যান্য  চিকিৎসা  পদ্ধতিসমূহ  মানুষের  ক্ষতিগ্রস্ত  ইমিউন  সিস্টেমকে (immune  system)  পুণরায়  শক্তিশালী  করার  মাধ্যমে  রোগ  নির্মূল  করে  থাকে।  পক্ষান্তরে  কেমোথেরাপি  এবং  রেডিওথেরাপি  মানুষের  ইমিউন  সিস্টেমকে  একেবারে  ধ্বংস  করে  দেয়।  ক্যানসার  হলো  একটি  ইমিউন  সিস্টেমের  রোগ।  কোন  মানুষের  ইমিউন  সিস্টেম  অর্থাৎ  রোগ  প্রতিরোধ  শক্তি  ক্ষতিগ্রস্ত  হলেই  কেবল  তাকে  ক্যানসার  আক্রমণ  করে  থাকে।  কাজেই  যেই  চিকিৎসা  পদ্ধতির  মাধ্যমে  ইমিউন  সিস্টেম  আরো  ক্ষতিগ্রস্ত  হয়,  তা  দিয়ে  কিভাবে  ক্যানসার  নির্মূল  করা  সম্ভব ?”। 

 

            বার্নেট  তাঁর  ক্লিনিক্যাল  গবেষণায়  লক্ষ্য  করেন  যে,  একটি  বা  দুটি  হোমিও  ঔষধ  ব্যবহারে  প্রায়ই  টিউমার  এবং  ক্যান্সার  সারানো  যায়  না।  কারণ  টিউমার/ ক্যান্সারের  পেছনে  সাধারণত  অনেকগুলো  কারণ (Link)  থাকে।  আর  একেকটি  কারণ  দূর  করতে  একেক  ধরনের  ঔষধের  প্রয়োজন  হয়।  তিনি  পিত্তপাথর  থেকে  কোলেস্টেরিনাম (Cholesterinum)  নামক  একটি  ঔষধ  আবিষ্কার  করেন  যা  দিয়ে  অনেক  লিভার  সিরোসিস  এবং  লিভার  ক্যান্সার  তিনি  নির্মুল  করেছেন।  হোমিওপ্যাথিতে  ক্যান্সার  চিকিৎসায়  ব্যর্থতার  একটি  মুল  কারণ  হলো  রোগীর  জীবনীশক্তিহীনতা  বা  মারাত্মক  শারীরিক  দুর্বলতা (low  vitality)।  অধিকাংশ  রোগী  কবিরাজি  এবং  এলোপ্যাথিক  চিকিৎসা  করে  শরীরের  বারোটা  বাজিয়ে  যখন  প্রাণ  ওষ্ঠাগত  হয়,  তখন  আসে  হোমিও  চিকিৎসকের  কাছে।  আমার  আশ্চর্য  লাগে  যখন  দেখি  লোকেরা  স্তন  টিউমার  এবং  স্তন  ক্যান্সারের  মতো  মামুলি  রোগে  অপারেশন,  কেমোথেরাপি,  রেডিওথেরাপি  ইত্যাদি  করে  ধ্যানাধ্যান  মৃত্যুর  কোলে  ঢলে  পড়ে।  অথচ  মহাপরাক্রমশালী  হোমিও  ঔষধের  কাছে  স্তন  টিউমার  এবং  স্তন  ক্যান্সার  একেবারে  মামুলি  রোগ।  স্তন  টিউমার  সম্পর্কে  বার্নেট  একটি  মজার  গল্প  লিখে  গেছেন।  এক  মহিলার  স্তনে  ক্যান্সার  হলে  বার্নেট  প্রায়  দেড়  বৎসর  হোমিও  ঔষধ  খাইয়ে  বিনা  অপারেশনে  সেটি  সারিয়ে  দেন।  কিছুদিন  পর  সেই  মহিলা  তার  এক  বান্ধবীকে  বার্নেটের  কাছে  নিয়ে  আসেন,  যার  ডান  স্তনে  একটি  টিউমার  হয়েছে।  ভদ্র  মহিলা  বার্নেটকে  জিজ্ঞেস  করলেন,  “এটি  নিরাময়  করতে  আপনার  কত  দিন  লাগবে ?”।  বার্নেট  বললেন,  “দুই  বৎসর”।  ভদ্র  মহিলা  বললেন,  “তাহলে  আমি  অপারেশন  করাকেই  ভালো  মনে  করি।  কেননা  তাতে  মাত্র  পনের  দিন  লাগে”।  তারপর  সে  অপারেশন  করাল  এবং  অপারেশনের  ছয়  মাস  পরে  তার  বাম  স্তনে  আবার  টিউমার  দেখা  দিল।  বাম  স্তনে  টিউমার  আবার  অপারেশন  করে  ফেলে  দেওয়ার  ছয়মাস  পরে  তার  জরায়ুতে  ক্যান্সার  দেখা  দেয়।  জরায়ুতে  অপারেশনের  কিছুদিন  পর  সে  মৃত্যুর  কোলে  ঢলে  পড়ল।  এভাবে  দুই  বছর  ঔষধ  খাওয়া  যার  কাছে  বিরক্তিকর  মনে  হয়েছিল,  তিন  তিনটি  অপারেশনের  ধাক্কায়  দেড়  বছরের  মধ্যে  সে  দুনিয়া  ছেড়ে  বিদায়  নিল।  হায় !  নির্বোধ  মানুষেরা  সব  বিষয়ে  কেবল  শর্টকার্ট  রাস্তা  খোঁজে ;  কিন্তু  তারা  বুঝতে  চায়  না  যে,  শর্টকার্ট  রাস্তা  প্রায়  সবক্ষেত্রেই  মানুষের  জন্য  ধ্বংস  ডেকে  আনে।  হোমিও  চিকিৎসা  বিজ্ঞানীরা  তাদের  গবেষণায়  লক্ষ্য  করেছেন  যে,  হোমিও  চিকিৎসার  মাধ্যমে  স্তন  টিউমার/ ক্যানসার  নিরাময়ের  পর  কিছু  কিছু  ক্ষেত্রে  গুণে  গুণে  ঠিক  বিশ  বছর  পর  সেগুলো  আবার  দেখা  দেয়  এবং  তখন  সেসব  রোগীদের  কাউকে  কাউকে  হোমিও  চিকিৎসার  মাধ্যমে  তিন  বছরের  বেশী  বাঁচিয়ে  রাখা  সম্ভব  হয়  না।  কাজেই  যারা  স্তন  টিউমার/ ক্যান্সারে  আক্রান্ত  হয়েছেন,  তাদের  কারো  কারো  আয়ু  আর  মাত্র  তেইশ (CCCIII)  বছর  বাকী  আছে  বলে  ধরে  নিতে  পারেন।

 

           

 

            হোমিওপ্যাথিকে  বলা  হয়  পূর্ণাঙ্গ  চিকিৎসা  বিজ্ঞান (holistic  healing  science)  অথবা  মনো-দৈহিক  গঠনগত (Constitutional  medicine)  চিকিৎসা  বিজ্ঞান।  অর্থাৎ  এতে  কেবল  রোগকে  টার্গেট  করে  চিকিৎসা  করা  হয়  না  বরং  সাথে  সাথে  রোগীকেও  টার্গেট  করে  চিকিৎসা  করা  হয়।  রোগীর  শারীরিক  এবং  মানসিক  গঠনে  কি  কি  ত্রুটি  আছে (congenital  defect),  সেগুলোকে  একজন  হোমিও  চিকিৎসক  খুঁজে  বের  করে  তাকে  সংশোধনের  চেষ্টা  করেন।  রোগটা  কি  জানার  পাশাপাশি  তিনি  রোগীর  মন-মানসিকতা  কেমন,  রোগীর  আবেগ-অনুভূতি  কেমন,  রোগীর  পছন্দ-অপছন্দ  কেমন,  রোগী  কি  কি  জিনিসকে  ভয়  পায়,  কি  ধরণের  স্বপ্ন  দেখে,  ঘামায়  কেমন,  ঘুম  কেমন,  পায়খানা-প্রস্রাব  কেমন,  কি  পেশায়  নিয়োজিত  আছে,  কি  কি  রোগ  সাধারণত  তার  বেশী  বেশী  হয়,  অতীতে  কি  কি  রোগ  হয়েছিল,  বংশে  কি  কি  রোগ  বেশী  দেখা  যায়,  রোগীর  মনের  ওপর  দিয়ে  কি  ঝড়  বয়ে  গেছে  ইত্যাদি  ইত্যাদি  জেনে  রোগীর  ব্যক্তিত্ব (individuality)  বুঝার  চেষ্টা  করেন  এবং  সেই  অনুযায়ী  ঔষধ  নির্বাচন  করেন।  এই  কারণে  হোমিওপ্যাথিক  ঔষধে  এমন  রোগও  সেরে  যায়,  যা  অন্যান্য  চিকিৎসা  পদ্ধতিতে  কল্পনাও  করা  যায়  না।  একজন  হোমিও  চিকিৎসক  রোগীর  শারীরিক  কষ্টের  চাইতে  বেশী  গুরুত্ব  দেন  রোগীর  মানসিক  অবস্থাকে।  কেননা  হোমিও  চিকিৎসা  বিজ্ঞানীরা  প্রমাণ  করেছেন  যে,  অধিকাংশ  জটিল  রোগের  সূচনা  হয়  মানসিক  আঘাত (mental  shock)  কিংবা  মানসিক  অসি’রতা/উৎকন্ঠা/দুঃশ্চিনতা (anxiety)  থেকে।  মোটকথা  অধিকাংশ  মারাত্মক  রোগের  প্রথম  শুরুটা  হয়  মনে  এবং  পরে  তা  ধীরে  ধীরে  শরীরে  প্রকাশ  পায়।  এজন্য  হোমিও  চিকিৎসা  বিজ্ঞানীরা  বলতেন  যে,  মনই  হলো  গিয়ে  আসল  মানুষটা (mind  is  the  man)।  তাছাড়া  পৃথিবীতে  হোমিও  ঔষধই  একমাত্র  ঔষধ  যাকে  মানুষের  শরীর  এবং  মনের  ওপর  পরীক্ষা-নিরীক্ষা  করে  আবিষ্কার  করা  হয়েছে।  পক্ষান্তরে  দুনিয়ার  অন্য  সমসত্ম  ঔষধই  আবিষ্কার  করা  হয়  ইঁদুর-খরগোশ-গিনিপিগ  ইত্যাদি  পশুদের  শরীরে  পরীক্ষা-নিরীক্ষা  করে।  এই  কারণে  হোমিও  ঔষধ  মানুষের  শরীর  ও  মনকে  যতটা  বুঝতে  পারে,  অন্য  কোন  ঔষধের  পক্ষেই  তা  সম্ভব  নয়। 

 

 

            সে  যাক,  টিউমার  এবং  ক্যান্সার  চিকিৎসায়  আমাদের  সকলেরই  উচিত  প্রথমে  হোমিওপ্যাথিক  চিকিৎসা  অবলম্বন  করা।  কেননা,  কেমোথেরাপি,  অপারেশন,  রেডিয়েশন  ইত্যাদি  শতকরা  নিরানব্বই  ভাগ  ক্ষেত্রেই  রোগীর  মৃত্যুকে  দ্রুত  ডেকে  আনে।  হোমিওপ্যাথিতে  টিউমার/ ক্যান্সার  চিকিৎসার  আরেকটি  বিরাট  সুবিধা  হলো  এতে  শতকরা  নিরানব্বই  ভাগ  ক্ষেত্রে  ব্যয়বহুল,  কষ্টদায়ক  এবং  ক্ষতিকারক  কোন  প্যাথলজিক্যাল  টেস্টের  দরকার  হয়  না (যেমন-বায়োপসি,  মেমোগ্রাফী,  এক্স-রে,  সিটি  ষ্ক্যান (CT  scan),  এমআরআই (MRI)  ইত্যাদি)।  কেননা  হোমিওপ্যাথিতে  ঔষধ  দেওয়া  হয়  রোগীর  শারীরিক  গঠন  এবং  মানসিক  বৈশিষ্ট্যের  ওপর  ভিত্তি  করে।  যারা  ইতিমধ্যে  কেমোথেরাপি,  অপারেশন,  রেডিয়েশান  ইত্যাদি  অপচিকিৎসা  নিয়ে  মৃত্যুর  দুয়ারে  পৌঁছে  গেছেন,  তাদেরও  কাল  বিলম্ব  না  করে  হোমিও  চিকিৎসা  গ্রহন  করা  উচিত।  ইহার  মাধ্যমে  তারা  ঐসব  কুচিকিৎসার  কুফল  থেকে  মুক্ত  হয়ে  আবারও  রোগমুক্ত  সুস্থ-সুন্দর  জীবনধারায়  ফিরে  আসতে  সক্ষম  হবেন।  যেহেতু  আমাদের  দেশে  মেধাসমপন্ন  হোমিও  চিকিৎসকের  যথেষ্ট  অভাব  রয়েছে,  সেজন্য  ক্যান্সার  বিশেষজ্ঞ  এবং  মেডিসিন  বিশেষজ্ঞদের  উচিত  সামান্য  কষ্ট  স্বীকার  করে  হোমিওপ্যাথি  আয়ত্ত  করে  নেওয়া  এবং  জনস্বার্থে  হোমিও  ঔষধ  প্রেসক্রাইব  করা।  কেননা  এগুলো  একই  সাথে  রোগের  জন্যও  ভালো  এবং  রোগীর  চিকিৎসা  ব্যয়ও  কমিয়ে  দেয়  একশ  ভাগ।  এমনকি  যে-সব  ক্ষেত্রে  ক্যান্সার  সারা  শরীরে  ব্যাপকভাবে  ছড়িয়ে  পড়ার  কারণে  রোগীকে  বাচাঁনো  কোন  মতেই  সম্ভব  নয়,  সেক্ষেত্রে  মৃত্যুর  পূর্ব  পর্যনত্ম  রোগীর  যাবতীয়  অমানুষিক  কষ্টসমূহ  নিয়ন্ত্রণে  রাখার  চিকিৎসাতেও (palliative  treatment)  হোমিও  ঔষধ  অন্য  যে-কোন  ঔষধের  চাইতে  সেরা  প্রমাণিত  হয়ে  থাকে।  তাই  যে-সব  সেবামুলক  সংস্থা  মানুষকে  ক্যান্সারের  চিকিৎসা  সেবা  প্রদানে  রত  আছে,  তারা  ইচ্ছে  করলে  ক্যানসারের  হোমিওপ্যাথিক  চিকিৎসা  সেবা  দেওয়ার  মাধ্যমে  একই  পয়সায়  আরো  শতগুণ  বেশী  মানুষকে  প্রকৃত  চিকিৎসা  সেবা  প্রদান  করতে  পারেন।

                                                                                                  

 

ডাঃ  বশীর  মাহমুদ  ইলিয়াস

গ্রন্থকার,  ডিজাইন  স্পেশালিষ্ট,  ইসলাম  গবেষক,  হোমিও  কনসালটেন্ট

চেম্বার ‍ঃ  ১৩/ক – কে.  এম.  দাস  লেন (২য় তলা),

(হুমায়ুন  সাহেবের  রেলগেইটের  সামান্য  পশ্চিমে 

এবং  হায়দার  ফামের্সীর  উপরে)

টিকাটুলী,  ঢাকা।

                                                ফোন ঃ +৮৮০-০১৯১৬০৩৮৫২৭

E-mail : Bashirmahmudellias@hotmail.com

Website : http://bashirmahmudellias.blogspot.com

Website : https://bashirmahmudellias.wordpress.com

সাক্ষাতের  সময় ‍ঃ  সন্ধ্যা  ৬:০০  টা  হইতে  রাত  ৯:০০  টা

Author: bashirmahmudellias

I am an Author, Design specialist, Islamic researcher, Homeopathic consultant.

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