Dr. Bashir Mahmud Ellias's Blog

Know Thyself

Heart

হোমিওপ্যাথিতে  হৃদরোগের  সর্বোত্তম  চিকিৎসা

Heart  diseases  and  their  best  treatment  in  homeopathy

            আমাদের  দেশের  মানুষ  যে  দুটি  রোগের  চিকিৎসা  করতে  গিয়ে  পথের  ভিখারীতে  পরিণত  হয়,  তার  একটি  হলো  ক্যান্সার  এবং  অন্যটি  হলো  হৃদরোগ  বা  হার্ট  ডিজিজ।  অথচ  অন্যান্য  জটিল  রোগের  মতো  হৃদরোগের  চিকিৎসাতেও  হোমিও  ঔষধ  শ্রেষ্টত্বের  দাবীদার।  বিভিন্ন  শ্রেণীর  লোকেরা  তাদের  ব্যবসায়িক  স্বার্থের  কারণে  প্রতিহিংষা  বশত  হোমিওপ্যাথি  সমপর্কে  নানা  রকমের  বদনাম  ছড়ায়।  তারমধ্যে  একটি  বড়  অপপ্রচার  হলো  হোমিও  ঔষধ  দেরীতে  কাজ  করে।  অথচ  হাই  ব্লাড  প্রেসার,  ডায়ারেটিস,  মাইগ্রেন,  হৃদরোগ,  কোষ্টকাঠিন্য,  গ্যাসট্রিক  আলসার  প্রভৃতি  অনেক  রোগের  জন্য  মানুষেরা  পঞ্চাশ  বছরও  এলোপ্যাথিক  ঔষধ  খেয়ে  পুরোপুরি  রোগমুক্ত  হতে  পারে  না।  দুর্ভাগ্যজনক  হলো  তারপরও  কেউ  বলে  না  যে,  এলোপ্যাথিক  ঔষধ  বিলম্বে  কাজ  করে।  হোমিওপ্যাথি  সমপর্কে  প্রচলিত  বদনামগুলির  মার্কেট  পাওয়ার  একটি  মুল  কারণ  হলো  নামডাকওয়ালা  দক্ষ  হোমিও  চিকিৎসকের  যথেষ্ট  অভাব।  হোমিও  চিকিৎসাবিজ্ঞানীদের  হৃদরোগ  চিকিৎসায়  সফলতার  বিবরণী  পড়লে  হতাশ  প্রাণে  আশার  আলো  দেখা  দেয়। 

             হার্টের  রক্তনালীতে  চর্বি  জমা (heart  block),  হার্টে  রিং  লাগানো,  হার্টের  ভাল্ব  নষ্ট  হওয়া,  হার্টে  ছিদ্র  হওয়া,  হার্টের  বাইপাস  সার্জারী,  ওপেন  হার্ট  সার্জারী,  হার্টে  পেসমেকার (pacemaker)  লাগানোর  মতো  জটিল  হৃদরোগও  হোমিওপ্যাথিতে  বিনা  অপারেশনে  স্রেফ  ঔষধেই  নিরাময়  করা  যায়।  এক  কথায়  বলা  যায়,  মহাপরাক্রমশালী  হোমিও  ঔষধের  কাছে  হৃদরোগ  একেবারে  তুচ্ছ।  হোমিওপ্যাথি  আমাদেরকে  এই  শিক্ষা  দেয়  যে,  রোগ  এবং  রোগের  কারণ  থাকে  মানুষের  শক্তি  সতরে (Energy  level)  যাকে  জীবনীশক্তি (Vital  force)  বলা  হয়।  পক্ষানতরে  শরীরে  এবং  মনে  আমরা  রোগ  নামে  যাকিছু  দেখি,  এগুলো  আসলে  রোগ  নয়  বরং  রোগের  ফলাফল  মাত্র।  হোমিওপ্যাথিক  চিকিৎসা  বিজ্ঞানের  মতে,  যেহেতু  রোগ  এবং  রোগের  কারণ  থাকে  মানুষের  শক্তি  সতরে (energy  level) ;  কাজেই  রোগ  নিরাময়কারী  ঔষধকেও  হতে  হবে  শক্তি  ঔষধ (Energy  medicine)।  কেননা  শক্তিই  কেবল  শক্তির  ওপর  প্রভাব  বিসতার (influence)  করতে  পারে,  পরিবর্তন (modification)  করতে  পারে।  ক্রুড  মেডিসিন  কখনও  জীবনীশক্তিকে  সপর্শ  করতে  পারে  না।  যেহেতু  জীবনীশক্তি  একটি  রহস্যময়  শক্তি।  হোমিও  ঔষধ  যেহেতু  লক্ষ  লক্ষ  বার  ঘর্ষণ (trituration)  এবং  ঝাঁকুনির (succussion)  মাধ্যমে  তৈরী  করা  হয়,  সেহেতু  এগুলো  শক্তিতে (energy)  পরিণত  হয়।  এই  দৃষ্টিতে  এলোপ্যাথিক  এবং  অন্যান্য  ঔষধকে  বলা  যায়  অপরিশোধিত  ঔষধ (crude  drug)। 

        আমাদের  জীবনী  শক্তি  বিকৃত (deviate)  হলেই  শরীর  ও  মনে  নানারকম  রোগের  উৎপত্তি  হয়।  জীবনী  শক্তি  তার  স্বাভাবিক  পথ  থেকে  লাইনচ্যুত (out  of  track)  হলেই  শরীর  এবং  মনে  ধ্বংসাত্মক (destructive)  ক্রিয়াকলাপের  সুচনা  হয়।  যেমন  টিউমারের  সৃষ্টি  হওয়া (neoplasm),  পাথর  তৈরী  হওয়া (calculus),  ব্যাকটেরিয়া-ভাইরাসের  আক্রমণ (germ  infection),  কোন  অঙ্গ  সরু  হওয়া (atrophy),  কোন  অঙ্গ  মোটা  হওয়া  বা  ফুলে  যাওয়া (hypertrophy)  ইত্যাদি  ইত্যাদি।  পরবর্তীতে  ঔষধের  মাধ্যমে  যদি  আমরা  জীবনী  শক্তিকে  সঠিক  পথে  ফিরিয়ে (back  to  the  track)  আনতে  পারি,  তবে  শরীর  ও  মনে  আবার  বিপরীতমুখী  ক্রিয়ার (reverse  action),  মেরামতকরণ (reconstructive)  ক্রিয়া  আরম্ভ  হয়।  আমাদের  শরীর  তখন  নিজেই  টিউমারকে  শোষণ (absorb)  করে  নেয়,  পাথরকে  গলিয়ে (dissolve)  বের  করে  দেয়,  জীবাণুকে  তাড়িয়ে  দেয়,  সরু  এবং  ফুলা  অঙ্গকে  স্বাভাবিক  করে  দেয়  ইত্যাদি  ইত্যাদি।  এভাবে  ঔষধ  প্রয়োগে  জীবনীশক্তিকে  উজ্জীবিত  করার  মাধ্যমে  শরীরের  নিজস্ব  রোগ  নিরাময়  ক্ষমতাকে  ব্যবহার  করে  রোগমুক্তি  অর্জন  করাই  হলো  প্রাকৃতিক (natural)  এবং  সঠিক  পদ্ধতি। 

        হৃদপিন্ডে (heart)  ছুরি-চাকু  চালানো,  স্টিলের  রিং  লাগানো,  বৈদ্যুতিক  ব্যাটারী  লাগানো  ইত্যাদি  কখনও  সঠিক  চিকিৎসা  হতে  পারে  না।  কারণ  এতে  রোগের  ফলাফলটা  কিছুদিনের  জন্য  চলে  গেলেও,  রোগের  কারণটা  কিন’  ঠিকই  রয়ে  যায়।  ফলে  সেটি  ভেতরে  ভেতরে  অন্য  রোগ  সৃষ্টিতে  আত্মনিয়োগ  করে।  আপনার  হার্টের  কোন  রক্তনালীতে  চর্বি  জমে  ব্লক  হয়ে  গেলো  আর  আপনি  অপারেশন  করে  তাতে  লোহার  পাইপ  বসিয়ে  দিলেন।  এতে  আপনি  একটি  ব্লকের  হাত  থেকে  বেঁচে  গেলেন  সত্য  কিন’  যে-কারণে  ব্লকটি  সৃষ্টি  হয়েছিল,  সেটি  ত  রয়েই  গেলো।  ফলে  কিছুদিন  পরপর  একটার  পর  একটা  ব্লক  পড়তে  থাকবে।  তখন  আপনি  কতবার  অপারেশন  করে  লোহার  পাইপ (ring)  বসাবেন।  আপনি  হয়ত  ভাবছেন  যে,  আপনার  রোগটি  সেরে  গেছে।  আসলে  এতে  আপনার  আয়ু  হ্রাস  পেয়েছে  চলিস্নশ  বছর।  হৃৎপিন্ড  এবং  ব্রেন  মানুষের  সবচেয়ে  সেনসেটিভ  অঙ্গ।  এগুলোতে  ছুরি  চালানো  এবং  লোহা-লক্কড়  ফিট  করে  দেওয়া  চরম  নির্বুদ্ধিতা।  হৃদপিন্ডের  যেখানে  নিজের  বোঝাই  বহন  করার  ক্ষ্মমতা  নাই,  সেখানে  আপনার  ফিট  করা  লোহা-লক্কড়ের  বোঝা  সে  কতদিন  বইতে  পারবে ?  এতে  পাঁচ  থেকে  দশ  বছরের  মধ্যে  আপনার  হার্ট  ফেইল  করে  কবরে  যাওয়ার  সম্ভাবনা  আছে  নিরানব্বই  ভাগ।  আমার  পরিচিত  একজন  স্ত্রীরোগ  বিশেষজ্ঞের  কথা  মনে  পড়ছে,  যাকে  হার্টের  ডাক্তাররা  বিশ  বছর  পূর্বে  হার্টের  বস্নকের  জন্য  রিং  লাগানোর  পরামর্শ  দিয়েছিলেন,  কিন’  তিনি  আজ  পরযন্ত  রিং  লাগান  নাই।  ঔষধ  খেয়ে  এবং  নিয়ম-কানুন  মেনে  চলে  বিশ  বছর  কাটিয়ে  দিয়েছেন।  বাস্তবে  দেখা  যায়,  ডাক্তাররা  রোগীদেরকে  দেয়  এক  রকম  পরামর্শ  আর  নিজেরা  চলেন  অন্যভাবে।  রোগীদেরকে  বলেন,  “তাড়াতাড়ি  অপারেশন  করেন,  সারাজীবন  ঔষধ  চালিয়ে  যেতে  হবে”  ইত্যাদি  ইত্যাদি  কিন’  নিজেরা  পারতপক্ষ্মে  অপারেশন  বা  ঔষধের  নিকটবর্তী  হন  না।

        একবার  একজন  মহৎপ্রাণ  শিশু  বিশেষজ্ঞের  নিকট  শুনেছিলাম  যে,  এক  বছরের  একটি  শিশুকে  তার  নিকট  চিকিৎসার  জন্য  আনা  হয়েছিল  যার  হার্টে  একটি  ছিদ্র (hole)  ধরা  পড়েছে।  হৃদরোগ  বিশেষজ্ঞরা  এক  মাস  পরে  তার  হার্টে  অপারেশন  করে  ছিদ্র  বন্ধ  করার  তারিখ  দিয়েছেন।  ভদ্রলোক  ভাবলেন,  শিশুটিকে  কিভাবে  অপারেশনের  হাত  থেকে  বাঁচানো  যায়  এবং  শিশুটির  দরিদ্র  অভিভাবকদের  এতগুলো  টাকা  কিভাবে  বাচাঁনো  যায় ?  তিনি  ভাবলেন,  শিশুটি  তার  মায়ের  পেটে  যখন  বৃদ্ধি  পাচ্ছিল,  তখন  নিশ্চয়  কোন  ত্রম্নটির  কারণে  হৃদপিন্ডের  এই  স’ানের  মাংস  বৃদ্ধি  পায়  নাই  এবং  এখানে  একটি  ছিদ্র  রয়ে  গেছে।  যেহেতু  চিনি  বা  মিষ্টি  জাতীয়  খাবারে  তাড়াতাড়ি  মাংস  বৃদ্ধি  পায়,  তাই  তিনি  শিশুটিকে  বেশী  বেশী  করে  গস্নুকোজ (glucose)  খাওয়ানোর  পরামর্শ  দিলেন।  একমাস  গস্নুকোজ  খাওয়ানোর  ফলে  দেখা  গেলো  চারপাশের  মাংস  বৃদ্ধি  পেয়ে  শিশুটির  হার্টের  ছিদ্র  বন্ধ  গেছে।  ফলে  শিশুটি  অপারেশনের  হাত  থেকে  বেচেঁ  গেলো।  এভাবে  আমাদের  শরীরকেই  প্রথমে  সুযোগ  দিতে  হবে  তার  নিজেকে  মেরামত  করার  জন্য।  কেননা  আমাদের  শরীর  নিজেই  হলো  তার  নিজের  সবচেয়ে  বড়  ডাক্তার। 

        উচ্চ  রক্তচাপ (high  blood  pressure)  সহ  যাবতীয়  হৃদরোগের  একটি  মূল  কারণ  হলো  মনকে  বেশী  বেশী  খাটানো  (অর্থাৎ  টেনশান  করা)  এবং  শরীরকে  আরামে  রাখা।  ফলে  শরীর  এবং  মনের  ক্রিয়াকর্মের  ভারসাম্য (balance)  নষ্ট  হয়ে  যায়।  মহান  আলস্নাহ  পবিত্র  কোরআনে  ঘোষণা  করেছেন  যে,  “নিশ্চয়  মানুষকে  পরিশ্রম  নির্ভর  করে  সৃষ্টি  করা  হয়েছে।  এজন্য  মানুষকে  পেটের  জন্য  পরিশ্রম  করতে  হয়,  বাড়ি-গাড়ির  জন্য  পরিশ্রম  করতে  হয়,  জ্ঞানার্জনের    জন্য  পরিশ্রম  করতে  হয় ;  এমনকি  কোন  অপকর্ম  করতে  গেলেও  আমাদেরকে  পরিশ্রম  করতে  হয়।  হ্যাঁ,  সত্যি  বিনা  পরিশ্রমে  এই  জগতে  কিছুই  পাওয়া  যায়  না।  আবার  চিকিৎসা  বিজ্ঞানও  বলে  যে,  সুস্থ  থাকতে  চাইলেও  আপনাকে  অবশ্যই  শারীরিক  পরিশ্রম  করতে  হবে।  আল্লাহ  তাআলা  মানুষকে  সুস্থ  রাখার  জন্য  দুনিয়াতে  এমন  সিষ্টেম  করে  দিয়েছেন  যে,  সবাইকে  একভাবে  না  একভাবে  পরিশ্রম/ব্যায়াম  করতেই  হচ্ছে।  শিশু-কিশোররা  সারাক্ষ্মণ  খেলাধুলা,  দৌড়াদৌড়ি,  হুড়োহুড়ি  করার  মাধ্যমে  শারীরিক  পরিশ্রম/ব্যায়াম  করছে।  এই  কারণে  শিশু-কিশোরদের  সাধারণত  অসুখ-বিসুখ  অনেক  কম  হয় (শিশু-কিশোরদের  বেশীর  ভাগ  অসুখের  মূল  কারণ  হলো  বেশী  বেশী  টিকা  [vaccine]  নেওয়া)।  যৌবনে  যুবক-যুবতীরা  বিবাহবন্ধনে  আবদ্ধ  হচ্ছে  এবং  স্বামী-স্ত্রীর  দৈনন্দিন  শারীরিক  মিলন  পৃথিবীর  সর্বশ্রেষ্ট  শারীরিক  পরিশ্রম/ব্যায়াম।  এই  কারণে  যুবক-যুবতীদেরও  সাধারণত  অসুখ-বিসুখ  অনেক  কম  হয়।  তাছাড়া  আল্লাহপাক  মানুষের  জন্য  যে  নামাজ,  রোজ,  হজ্জ  ইত্যাদি  ইবাদতের  নির্দেশ  দিয়েছেন,  তাও  এক  ধরণের  উত্তম  শারীরিক  পরিশ্রম/ব্যায়াম।  শহুরে  লোকদের  জীবনে  প্রযুক্তির  মাত্রাতিরিক্ত  ব্যবহারের  কারণে  শারীরিক  পরিশ্রম  নাই  বললেই  চলে।  কিন্তু  শারীরিক  পরিশ্রম  ছাড়া  জীবিকা  অর্জন  করা  সম্ভব  হলেও  সুস্থ  থাকা  সম্ভব  নয়।  সাধারণত  শহরের  মানুষরা  ডায়াবেটিসে  আক্রান্ত  হওয়ার  পূর্বে  শারীরিক  পরিশ্রমের  প্রয়োজনীয়তা  উপলব্ধি  করতে  পারে  না।  কিন্তু  সমস্যা  হলো  যখন  আমাদের  বয়স  চল্লিশের  উপরে  চলে  যায় ;  এই  বয়সে  মানুষরা  শিশু-কিশোরদের  মতো  খেলাধুলা-হুড়োহুড়িও  করে  না  আবার  স্বামী-স্ত্রীর  যে  শারীরিক  মিলন,  তাও  অনেক  কমে  যায়।  আর  এই  কারণেই  সাধারণত  চল্লিশের  দিকে  এসে  মানুষ  হৃদরোগে  আক্রান্ত  হতে  থাকে।  কৃষক,  কুলি,  মজুর,  রিক্সাচালক  ইত্যাদি  পরিশ্রমের  পেশায়  যারা  আছেন,  তাদেরকে  কখনও  উচ্চ  রক্তচাপে  আক্রান্ত  হতে  দেখেছেন ?

            এবার  আমি  খাওয়া-দাওয়া  সম্পর্কে  এমন  কিছু  কথা  বলব  যা  অনেক  ডাক্তাররাও  জানেন  না।  প্রথম  কথা  হলো  আমরা  প্রতিদিন  যে-সব  খাবার  খাই,  সেগুলোর  মূল  নিযার্স  আমাদের  পাকস্থলী (stomach)  এবং  ক্ষুদ্রান্ত-বৃহদ্রান্তের (intestine)  মাধ্যমে  শোষিত  হয়ে  রক্তের  মাধ্যমে  প্রতিটি  কোষে  কোষে  পৌঁছে  যায়।  সেখানে  নানারকমের  রাসায়নিক  বিক্রিয়ার  মাধ্যমে  খাদ্যের  এসব  মূল  উপাদানগুলো  থেকে  তিনটি  অক্সিজেনের  পরমাণু  তৈরী  হয়।  তার  মধ্যকার  দুইটি  অক্সিজেন  পরমাণু  আমাদের  শরীরের  উপকারে  লাগে  এবং  অতিরিক্ত  অপ্রয়োজনীয়  একটি  অক্সিজেন  পরমাণূ  শরীরের  ক্ষতি  করতে  থাকে।  এই  কারণে  যে  যত  বেশী  খায়,  সে  তত  বেশী  বেশী  রোগে  আক্রান্ত  হয়  এবং  তত  কম  বয়সে  মৃত্যুবরণ  করে।  খাদ্য  নিয়ন্ত্রণ  বা  বেশী  বেশী  রোজা  রাখা  এমন  একটি  ব্যবস্থা  যা  দ্বারা  আপনি  উচ্চ  রক্তচাপ,  ডায়াবেটিস,  হাঁপানি  এমনকি  ক্যানসার  পযর্ন্ত  সারিয়ে  ফেলতে  পারেন।  এগুলো  এখন  একেবারেই  বৈজ্ঞানিক  ভাবে  প্রমাণিত  সত্য।  জাতীয়  অধ্যাপক  ডাঃ  এম  আর  খান  একদিন  একটি  টিভি  অনুষ্টানে  বলেছিলেন  যে,  “আমার  যদি  ক্ষমতা  থাকত,  তবে  আমি  সপ্তাহে  দুই  দিন  রোজা  রাখা  বাধ্যতামূলক  করে  আইন  পাশ  করে  দিতাম।  কেননা  ডায়াবেটিস  এবং  উচ্চ  রক্তচাপ  নিরাময়ে  ইহার  কোন  তুলনা  হয়  না”।  একই  অনুষ্টানে  তিনি  আরও  বলেছিলেন  যে,  “উচ্চ  রক্তচাপের  সবচেয়ে  ভালো  চিকিৎসা  হলো  ঘন  ঘন  অজু  করা”।  আমি  নিজেই  আমার  কয়েকটি  দুরারোগ্য  কঠিন  রোগ  বেশী  বেশী  খাদ্য  নিয়ন্ত্রণের / রোজা  রাখার  মাধ্যমে  সারিয়ে  ফেলেছি।  যারা  রোগমুক্ত  দীর্ঘজীবন  লাভ  করতে  চান,  তাদের  অবশ্যই  বেশী  বেশী  খাদ্য  নিয়ন্ত্রণ / রোজা  রাখা  উচিত।  কেউ  কেউ  ভাবতে  পারেন  যে,  খাবারের  পরিমাণ  কমালে  শরীর  দুর্বল  হয়ে  পড়বে।  কিন্তু  এটি  একেবারেই  ভুল  ধারণা।  আসল  কথা  হলো  খাবার  থেকে  আমরা  শক্তি  পাই  ঠিকই ;  আবার  এই  খাবারগুলোকে  হজম  করতে  গিয়েও  আমাদের  শরীরকে  অনেক  শক্তি  খরচও  করতে  হয়।  আসলে  সবকিছুই  হলো  অভ্যাসের  ব্যাপার।  কথায়  বলে,  “শরীরের  নাম  মহাশয়,  যাহা  সহাবে  তাহাই  সয়”।  তাই  দেখা  যায়,  ফকির-দরবেশ-পীর-আউলিয়াদের  জীবনী  পড়লে  জানা  যায়,  তাদের  কেউ  কেউ  তিন  দিনে  একবেলা  খেতেন,  কেউ  সাত  দিনে,  কেউ  কুড়ি  দিনে  আবার  কে‌উ  চল্লিশ  দিনে  একবেলা  আহার  করতেন।  তারপরও  তাঁরা  আল্লাহ্‌র  ইবাদত-বন্দেগীতে  যতো  কঠোর  পরিশ্রম  করতেন, তা  আমাদের  পক্ষে  তিনবেলা  পেট  ভরে  খেয়েও  সম্ভব  হবে  না।  তাদের  অনেকে  বলতেন  যে,  অনাহারে  থাকলে  তারা  শক্তি  পান  এবং  খেলে  বরং  দুর্বলতা  বোধ  করেন।

        হৃদরোগের  হাত  থেকে  বাচাঁর  জন্য  বয়স  চল্লিশ  হওয়া  মাত্রই  আমাদেরকে  অবশ্যই  নিয়মিত  পর্যাপ্ত  শারীরিক  পরিশ্রম/ব্যায়াম  করা  শুরু  করতে  হবে।  পাশাপাশি  খাওয়া-দাওয়ার  পরিমাণ  কমিয়ে  দিতে  হবে  আগের  চাইতে  অর্ধেকে।  কারণ  চল্লিশের  পরে  আর  শারীরিক  বৃদ্ধি  ঘটে  না।  ফলে  শরীরের  চাহিদা  কমে  যায়।  তাই  খাওয়া-দাওয়ার  পরিমাণ  না  কমালে  অতিরিক্ত  ক্যালরি  শরীরে  জমে  শরীর  মোটা  হয়ে  যায়।  আর  মোটা  হওয়া  বা  শরীরের  ওজন  বেড়ে  যাওয়া  হলো  হৃদরোগের  একটি  বড়  কারণ।  তবে  যারা  শারীরিক  পরিশ্রমযুক্ত  কোন  পেশায়  আছেন (যেমন-রিক্সা  চালানো),  তাদের  খাওয়া-দাওয়ার  পরিমাণ  কমানোর  কোন  প্রয়োজন  নাই।  সবচেয়ে  দুঃখজনক  ঘটনা  হলো,  উচ্চ  রক্তচাপের (hypertension)  চিকিৎসার  জন্য  রোগীরা  ডাক্তারের  কাছে  গেলেও  ডাক্তাররা  কেবল  একটি  বা  দুটি  ঔষধ  ধরিয়ে  দিয়ে  বিদায়  করেন।  ব্যায়াম  করা,  খাবার  নিয়ন্ত্রণ  করা,  টেনশান  পরিহার  করা  ইত্যাদি  গুরুত্বপূর্ণ  বিষয়গুলোকে  রোগীদের  বুঝিয়ে  বলেন  না।  ফলে  হাইপ্রেসারের  রোগীরা  যতই  ঔষধ  খান  না  কেন  তাদের  প্রেসারও  দিনদিন  কেবল  বাড়তেই  থাকে।  তাছাড়া  হাই  ব্লাড  প্রেসারের  ঔষধগুলো  হার্টকে  এতই  দুর্বল  করে  ফেলে  যে,  এগুলো  পাঁচ-দশ  বছর  খাওয়ার  পরে  নিরানব্বই  ভাগ  রোগী  হার্ট  ফেইল  করে  মারা  পড়েন।  হাই  প্রেসারের  জন্য  যুগের  পর  যুগ  ঔষধ  খাওয়ার  চাইতে  হোমিও  চিকিৎসা  অবলম্বন  করা  উচিত।  হোমিও  ঔষধের  মাধ্যমে  দুয়েক  বছরের  মধ্যেই  হাই  ব্লাড  প্রেসার  স্থায়ীভাবে  নিরাময়  করা  যায়।

        হোমিওপ্যাথিকে  বলা  হয়  পূর্ণাঙ্গ (holistic)  চিকিৎসা  বিজ্ঞান  অথবা  মনো-দৈহিক  গঠনগত (constitutional)  চিকিৎসা  বিজ্ঞান  অর্থাৎ  এতে  কেবল  রোগকে  টার্গেট  করে  চিকিৎসা  করা  হয়  না  বরং  সাথে  সাথে  রোগীকেও  টার্গেট  করে  চিকিৎসা  করা  হয়।  রোগীর  শারীরিক  এবং  মানসিক  গঠনে  কি  কি  ত্রুটি  আছে,  সেগুলোকে  একজন  হোমিও  চিকিৎসক  খুঁজে  বের  করে  তাকে  সংশোধনের  চেষ্টা  করেন।  রোগটা  কি  জানার  পাশাপাশি  তিনি  রোগীর  মন-মানসিকতা  কেমন,  রোগীর  আবেগ-অনুভূতি  কেমন,  রোগীর  পছন্দ-অপছন্দ  কেমন,  রোগী  কি  কি  জিনিসকে  ভয়  পায়,  কি  ধরণের  স্বপ্ন  দেখে,  ঘামায়  কেমন,  ঘুম  কেমন,  পায়খানা-প্রস্রাব  কেমন,  পেশা  কি,  কি  কি  রোগ  সাধারণত  বেশী  বেশী  হয়,  অতীতে  কি  কি  রোগ  হয়েছিল,  বংশে  কি  কি  রোগ  বেশী  দেখা  যায়,  রোগীর  মনের  ওপর  দিয়ে  কি  ঝড়  বয়ে  গেছে  ইত্যাদি  ইত্যাদি  জেনে  রোগীর  ব্যক্তিত্ব (individuality)  বুঝার  চেষ্টা  করেন  এবং  সেই  অনুযায়ী  ঔষধ  নির্বাচন  করেন।  এই  কারণে  হোমিওপ্যাথিক  ঔষধে  এমন  রোগও  খুব  সহজে  সেরে  যায়,  যা  অন্যান্য  চিকিৎসা  পদ্ধতিতে  কল্পনাও  করা  যায়  না।  একজন  হোমিও  চিকিৎসক  রোগীর  শারীরিক  কষ্টের  চাইতে  বেশী  গুরম্নত্ব  দেন  রোগীর  মানসিক  অবস্থাাকে।  কেননা  হোমিও  চিকিৎসা  বিজ্ঞানীরা  প্রমাণ  করেছেন  যে,  অধিকাংশ  জটিল  রোগের  সূচনা  হয়  মানসিক  আঘাত (mental  shock)  কিংবা  মানসিক  অসি’রতা/উৎকন্ঠা/দুঃশ্চিনতা (anxiety)  থেকে।  মোটকথা  মারাত্মক  রোগের  প্রথম  শুরুটা হয়  মনে  এবং  পরে  তা  ধীরে  ধীরে  শরীরে  প্রকাশ  পায়।  এজন্য  হোমিও  চিকিৎসা  বিজ্ঞানীরা  বলতেন  যে,  মনই  হলো  গিয়ে  আসল  মানুষটা (mind  is  the  man)।  তাছাড়া  পৃথিবীতে  হোমিও  ঔষধই  একমাত্র  ঔষধ  যাকে  মানুষের  শরীর  ও  মনে  পরীক্ষা-নিরীক্ষা  করে  আবিষ্কার  করা  হয়েছে।  এই  কারণে  হোমিও  ঔষধ  মানুষের  শরীর  ও  মনকে  যতটা  বুঝতে  পারে,  অন্য  কোন  ঔষধের  পক্ষে  তা  সম্ভব  নয়।

        চিকিৎসা  বিজ্ঞানকে  যিনি  রোগের  নামের  গোলামী  থেকে  মুক্তি  দিয়েছেন  তার  নাম  হ্যানিম্যান।  এই  কৃতিত্বের  দাবীদার  একমাত্র  তিনি।  হৃদরোগ  বিশেষজ্ঞরা  রোগের  যত  কঠিন  কঠিন  নামই  দেন  না  কেন,  তাতে  একজন  হোমিও  ডাক্তারের  ভয়  পাওয়ার  বা  দুঃশ্চিনতার  করার  কিছু  নাই।  রোগের  লক্ষ্মণ  এবং  রোগীর  শারীরিক-মানসিক  বৈশিষ্ট্য  অনুযায়ী  ঔষধ  দিতে  থাকুন।  রোগের  নাম  যাই  হোক  না  কেন,  তা  সারতে  বাধ্য।  হ্যানিম্যান  তাই  শত-সহস্রবার  প্রমাণ  করে  দেখিয়ে  দিয়ে  গেছেন।  রোগীর  মাথার  চুল  থেকে  পায়ের  নখ  পর্যনত  সমস্ত  লক্ষণ  সংগ্রহ  করুন  এবং  তার  মনে  গহীনে  অন্তরের  অলিতে-গলিতে  যত  ঘটনা-দুর্ঘটনা  জমা  আছে,  তার  সংবাদ  জেনে  নিন।  তারপর  সেই  অনুযায়ী  ঔষধ  নির্বাচন  করে  খাওয়াতে  থাকুন।  হৃদরোগ  বাপ  বাপ  ডাক  ছেড়ে  পালাবে।  রোগের  নাম  নিয়ে  অযথা  সময়  নষ্ট  করার  কোন  দরকার  নাই।  হোমিও  চিকিৎসায়  যদি  আপনার  হৃদরোগ  নির্মূল  না  হয় (অথবা  কোন  উন্নতি  না  হয়),  তবে  হোমিওপ্যাথির  ওপর  বিশ্বাস  হারাবেন  না।  কেননা  এটি  সেই  হোমিও  ডাক্তারের  ব্যর্থতা।  হোমিওপ্যাথির  কোন  ব্যর্থতা  নাই।  সূর্য  পূর্ব  দিকে  উদিত  হয়ে  পশ্চিম  দিকে  অস্ত  যায়-  ইহা  যেমন  চিরন্তন  সত্য ;  তেমনি  হোমিওপ্যাথির  সকল  থিওরীও  চিরন্তন  সত্য।  এতে  কোন  অবৈজ্ঞানিক  কথা  বা  বিজ্ঞানের  নামে  গোজামিলের  স্থান  নাই। 

 

            যদিও  সমগ্র  লক্ষণ  অনুসারে  নির্বাচিত  যে-কোন  হোমিও  ঔষধেই  যে-কোন  হৃদরোগ  নিরাময়  হয়ে  যায়,  তথাপিও  এমন  কিছু  হোমিও  ঔষধ  আছে  যারা  হোমিওপ্যাথিতে  হৃদরোগের  চিকিৎসায়  বেশী  বেশী  ব্যবহৃত  হয়।  তাদের  মধ্যে  আছে  Adonis  vernalis,  Amylenum  nitrosum,  Arnica  montana,  Cactus  grandiflorus,  Convallaria  majalis,  Crataegus  oxyacantha,  Digitalis  purpurea,  Iberis  amara,  Kalmia  Latifolia,  Lachesis  mutus,  Latrodectus  mactans,  Laurocerasus,  Lilium tig,  Lycopus  virginicus,  Naja  tripudians,  Natrum  muriaticum,  Aurum  metallicum, vanadium,  Spigelia  anthelmintica  ইত্যাদি।  এদের  মধ্যে  ক্রেটিগাস (Crataegus  oxyacantha)  ঔষধটি  হলো  হার্টের  জন্য  টনিকের  মতো  যার  তেমন  কোন  সাইড-ইফেক্ট  নাই।  এটি  একাই  শতকরা  ৯০%  ভাগ  হৃদরোগ  নিরাময়ের  ক্ষমতা  রাখে।  আজ  থেকে  একশ  বছর  পূরবে  আয়ারল্যান্ডের  ডাঃ  গ্রীন  নামক  একজন  হোমিও  চিকিৎসা  বিজ্ঞানী  এটি  আবিষ্কার  করেন।  তিনি  শুধু  এই  একটি  ঔষধ  দিয়ে  এত  এত  হৃদরোগী  আরোগ্য  করেছিলেন  যে,  সারা  পৃথিবীতে  হৃদরোগের  শ্রেষ্ঠ  চিকিৎসক  হিসেবে  তার  নাম  ছড়িয়ে  পড়েছিল  এবং  দুনিয়ার  সকল  প্রান্ত  থেকে  হৃদরোগীরা  পঙপালের  ন্যায়  আয়ারল্যান্ডে  ছুটে  যেতো।  তিনি  নিম্নশক্তিতে  পাঁচ  ফোটা  করে  রোজ  ৪  বার  করে  খাইয়ে  অধিকাংশ  হৃদরোগীকে  রোগমুক্ত  করতে  সক্ষম  হতেন।

        কাজেই  হৃদরোগ  চিকিৎসায়ও  আমাদের  সকলেরই  উচিত  প্রথমে  হোমিওপ্যাথিক  চিকিৎসা  অবলম্বন  করা।  কেননা  অন্যান্য  চিকিৎসা  বিজ্ঞানের  তুলনায়  কমপক্ষে  একশ  ভাগ  কম  খরচে  হোমিও  চিকিৎসায়  হৃদরোগ  থেকে  মুক্ত  হওয়া  সম্ভব।  অপরদিকে  অন্যান্য  জাতীয়  ঔষধ  এবং  অপারেশন  বেশীর  ভাগ  ক্ষেত্রেই  হৃদরোগীর  মৃত্যুকে  দ্রুত  ডেকে  আনে।  সে  যাক,  হৃদরোগ  চিকিৎসায়  ভালো  নামডাকওয়ালা  বিশেষজ্ঞ  হোমিও  ডাক্তারের  স্মরণাপন্ন  হওয়া  উচিত।  কেননা  সাধারণ  হোমিও  ডাক্তারদের  দ্বারা  হৃদরোগের  চিকিৎসা  সফল  হওয়ার  সম্ভাবনা  নাই ;  বরং  হোমিওপ্যাথিতে  প্রচণ্ড  দক্ষতা  আছে  এমন  চিকিৎসক  প্রয়োজন।  যেহেতু  আমাদের  দেশে  মেধাসমপন্ন  হোমিও  চিকিৎসকের  যথেষ্ট  অভাব  রয়েছে,  সেজন্য  এলোপ্যাথিক  ডাক্তার  বিশেষত  হৃদরোগ  বিশেষজ্ঞদের  উচিত  জনস্বার্থে  হোমিও  ঔষধ  প্রেসক্রাইব  করা।  কেননা  এগুলো  একই  সাথে  রোগের  জন্যও  ভালো  এবং  রোগীর  চিকিৎসা  ব্যয়ও  কমাবে  হাজার  ভাগ।    একথা  আমি  গ্যারান্টি  সহকারে  বলতে  পারি  যে,  হোমিওপ্যাথি  আয়ত্ত  করতে  একজন  সাধারণ  মানুষের  যদি  লাগে  দশ  বছর ;  তবে  একজন  এম.বি.বি.এস.  ডাক্তার  বা  একজন  হৃদরোগ  বিশেষজ্ঞের  লাগবে  এক  বছর। 

         পাশ্চাত্যের  উন্নত  দেশগুলোর  মতো  আমাদের  দেশের  অনেক  মেধাবী  এলোপ্যাথিক  ডাক্তাররাও  ইদানীং  নিয়মিত  হোমিওপ্যাথি  প্রেকটিস  করছেন।  আমার  জানামতে,  কেবল  ঢাকা  সিটিতে  শতাধিক  এম.বি.বি.এস.  এবং  পোষ্ট-গ্রাজুয়েট  ডিগ্রীধারী  এলোপ্যাথিক  ডাক্তার  ফুলটাইম  হোমিওপ্যাথি  প্র্যাকটিস  করছেন।  তাছাড়া  হোমিওপ্যাথির  আবিষ্কারক  মহা  চিকিৎসা  বিজ্ঞানী  ডাঃ  স্যামুয়েল  হ্যানিম্যান  নিজে  বিশ্ববিদ্যালয়ের  সর্বোচ্চ  ডিগ্রীধারী  এলোপ্যাথিক  ডাক্তার  ছিলেন  এবং  হোমিওপ্যাথির  উন্নয়ন  ও  প্রসারে  যে  অর্ধশতাধিক  হোমিও  চিকিৎসা  বিজ্ঞানী  জীবন  উৎসর্গ  করেছেন,  তাদের  সকলেই  বিশ্ববিদ্যালয়ের  সর্বোচ্চ  ডিগ্রীধারী  এলোপ্যাথিক  ডাক্তার  ছিলেন।  সুতরাং  এলোপ্যাথিক  ডাক্তারদের  হোমিওপ্যাথি  প্র্যাকটিস  করতে  আইনগত  কোন  বাধা  থাকার  কথা  নয়।  সবচেয়ে  ভালো  হয়  যদি  এম. বি. বি. এস.  ডাক্তারদের  জন্য  সরকার  বঙ্গবন্ধু  মেডিক্যাল  ইউনিভার্সিটিতে  হোমিওপ্যাথির  উপর  এক  বছরের  একটি  পোষ্ট-গ্রাজুয়েট  ডিপ্লোমা  কোর্স  চালু  করেন।

ডাঃ  বশীর  মাহমুদ  ইলিয়াস

গ্রন্থকার,  ডিজাইন  স্পেশালিষ্ট,  ইসলাম  গবেষক,  হোমিও  কনসালটেন্ট

চেম্বার ‍ঃ  ১৩/ক – কে.  এম.  দাস  লেন (২য় তলা),

(হুমায়ুন  সাহেবের  রেলগেইটের  সামান্য  পশ্চিমে 

এবং  হায়দার  ফামের্সীর  উপরে)

টিকাটুলী,  ঢাকা।

                                ফোন ঃ +৮৮০-০১৯১৬০৩৮৫২৭

E-mail : Bashirmahmudellias@hotmail.com

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সাক্ষাতের  সময় ‍ঃ  সন্ধ্যা  ৬:০০  টা  হইতে  রাত  ৯:০০  টা

ক্যানসারের  চিকিৎসায়  ভয়ঙ্কর  বিপদ

http://bashirmahmudellias.blogspot.com/2009/10/cancer-and-its-perilous-treatment_31.html

মানসিক  রোগীদের  চরম  দুর্ভাগ্য

http://bashirmahmudellias.blogspot.com/2009/10/mental-patients-their-tradgedy.html

হৃদরোগের  সবচেয়ে  ভালো  চিকিৎসা  আছে  হোমিওপ্যাথিতে

http://bashirmahmudellias.blogspot.com/2010/02/cardiac-diseases-their-easy-cure.html

কিডনী  রোগের  প্রকৃত  কারণ  এবং  চিকিৎসা

http://bashirmahmudellias.blogspot.com/2009/10/kidney-diseases-their-real-cause-and.html

শিশুদের  টিকা  থেকে  সাবধান

http://bashirmahmudellias.blogspot.com/2008/10/beware-of-childhood-vaccine.html

হোমিওপ্যাথিক  ঔষধ  ছাড়া  ডায়াবেটিস  নিমূর্ল  হয়  না

http://bashirmahmudellias.blogspot.com/2009/09/diabetes-and-some-hard-talks.html

হেপাটাইটিস  একটি  ফালতু  রোগ

http://bashirmahmudellias.blogspot.com/2008/11/hepatitis-is-not-incurable-disease.html

প্যাথলজিক্যাল  টেস্ট  মারাত্মক  ক্ষতিকর

http://bashirmahmudellias.blogspot.com/2010/04/pathological-tests-are-seriously.html

ফ্রি  হোমিওপ্যাথিক  ই-কনসালটেশান

Free  homeopathic  e-consultation

http://bashirmahmudellias.blogspot.com/2009/11/free-homeopathic-e-consultation.html

Homoeopathic Approach to the Diseases of the Cardiovascular System

Dr. Rajat Chattopadhyay, BHMS, MD

In the present fast age the diseases of cardio vascular system are becoming burning problem in our society. In the previous years the diseases were quiet prevalent in developed countries like U.S.A. But with the fast globalization the occurrence of diseases are increasing very rapidly in the developing countries also, like our India. Among the very many cardio vascular diseases the incidences of Ischaemic heart diseases and Coronary artery diseases are major in number, though the incidences of rheumatic fever, congenital cyanotic heart diseases are not very uncommon happenings in our society.Homoeopathic physician as a general practitioner and clinician should bear the responsibility of tackling these diseases. Majority of the Homoeopaths are general practitioner in nature as because till date the conception of Homoeopathic specialization or super specialization is not developed and on the other hand it violets the very basics and the fundamental principles of the Homoeopathic system of medicine. So the preliminary screening or the first time identification of the diseases is the responsibility of every Homoeopathic Physician. For this purpose one should have sound knowledge of Practice of Medicine as well as he should be acquainted with the basic philosophical background of Homoeopathic System of medicine.

A Homoeopath should treat the patient of cardio vascular diseases with much confidence. Homoeopathic approach does not always indicate the therapeutic approach. Therapeutic approach quiet differs from the homoeopathic concept – the concept of Individualization. In each and every disease, without influenced by the aetio-pathogenesis, we should search for the cause of the cause – the dynamic cause as well as the detail history of the evolution of the disease from its inception in a very individual which differs one from another. One has to go through, rather searched for, the detailed symptomatology and earnest effort to be completed in location, sensation, modalities, concomitants and any other feature related to the disease condition. For example Palpitation is one of the most important symptoms of the valvular diseases. So by knowing and remembering this symptom (palpitation) of valvular disease one can not constitute the totality until we clarify it in the domain of Homoeopathic philosophy like the different characteristics of modalities, peculiar sensations, concomitants etc.

In another example the typical characteristic pain of the Ischaemic Heart Diseases are of less value from homoeopathic view if it is not more specified by different questioning from homoeopathic angle. During completion of the signs and the symptomatology we should think of those signs & symptoms which are developed due to disease pathology though in various cases those seems to be appear as the very characteristic from Homoeopathic stand point. In reality those signs & symptoms are of less value in framing the totality and ultimately to reach to the simillimum.

In the management of the cardio vascular diseases the Tactfulness and the knowledge of the modern / latest investigations, latest nutrition for dietetic management etc. are of utmost importance. One can not refrain from taking the advantages of ultra modern bio technologies for the benefit of the patient. In the era of Consumer Protection Act the diagnosis is must in every cases and it should be done by every Homoeopath. It will also elevate the self confidence level as well as the patient’s reliability on the physician.

The knowledge of Pathology, micro biology, Molecular biology, Genetic theory etc also are to be considered but any one should not misunderstand my word that these are not to be considered at all. For making the diagnosis as a clinician you should be superior one with all of the available modern tools, but it is my sincere request to all of you, specially to the fresh graduates, that during framing the totality, restrict yourself within the domain of Homoeopathic Philosophy and exhaust your self to enhance the quality of the common symptomatology found in a patient, so that the uncommonness, the peculiarity may show the way of reaching to the simillimum.

Last of all I should say that every system of treatment has got certain limitations and all might be aware of that in their own field.  Homoeopathic system of Medicine is not an exceptional one. Multiple cases are under surgical conditions in which surgical interference are the most necessary one to perform. Apart from the surgical conditions all the other diseases you can deal with lots of self esteem by which the suffering humanity will be benefited. From the congenital cyanotic heart diseases to the conditions of heart failures, SBE etc. all are the treatable disease under Homoeopathic system of medicine if proper management is given with the medicine.

The stage of the diseases is very important to know the prognosis of the case. It can be claimed that in irreversible disease pathology when only palliation can be given, at that time the Homoeopathic palliation is one of the best and safest palliation in the present era. In few cases lack of “the indications” will compel you to palliate the disease condition, but in those cases also palliation should by no mean the specific one, rather it should be Homoeopathic specific – group specific – abiding by the concept of the Individualization.

At last, I have to say some comments on the curability of the disease and about our scope and limitations:- There should not be any hard and fast or fixed rule regarding the scope and limitations in the Homoeopathic System of Medicine(rather it will be better if I can say in  MEDICINE!). Remembering all the Pathology (reversible & irreversible), Medicine (incurable/curable/preventable), Homoeopathic Philosophy (Organon of medicine & other philosophy of the stalwarts), I can say with utmost confidence that it is the case; it is the patient and his circumstances which remain responsible for the real prognosis of the diseased patient. You can guess or predict but you should not be enough confident one to declare anything a priory on the basis of some fixed principle. We should remember today’s rationality is based on the empiricism of the past and the today’s rational idea may prove wrong in the future and the empirical thinkers of now may prove themselves rational with the changing world.

 

http://www.homeorizon.com/homeopathic-articles/cardiology/heart-disease-treatment

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