Dr. Bashir Mahmud Ellias's Blog

Know Thyself

Vaccine

শিশুদের  টিকা  থেকে  সাবধান !

Beware  of  childhood  vaccines

(Read  a  similar  article  in  English  from  the   link  given  below)

https://currenthealthscenario.blogspot.com/2011/04/50-reasons-to-protect-infants-from.html

http://www.whale.to/vaccine/chatterjee.html

সেদিন  একজন  সরকারী  কর্মকর্তার  শিশু  সন্তানকে  যখন  টিকা  দেওয়া  হলো  তখন  সাথে  সাথেই  শিশুটির  সমস্ত  শরীর  প্যারালাইজড  হয়ে  মরণাপন্ন  দশায়  উপনীত  হয়।  দ্রুত  একটি  দামী  ক্লিনিকে  ভর্তি  করে  প্রায়  অর্ধ  লক্ষাধিক  টাকা  খরচ  করে  শিশুটিকে  প্রাণে  বাচাঁনো  সম্ভব  হয়।  এই  ঘটনায়  তার  সহকর্মী  এবং  অধীনস্থ  কর্মচারীদের  অনেকেই  আড়ালে-আবডালে  মন্তব্য  করছিল  যে,  “ঘুষখোরের  উপর  আল্লাহর  গযব  পড়েছে’’।  আসলেই  কি  এটি  গজব  ছিল ?  ধর্মীয়  বা  নীতি-নৈতিকতার  দৃষ্টিতে  মন্তব্যটি  সঠিক  হলেও  বিজ্ঞান  কিন্তু  তা  বলে  না।  হ্যাঁ,  টিকার  যতগুলো  মারাত্মক  পার্শ্ব  প্রতিক্রিয়া  আছে,  তার  মধ্যে  একটি  হলো  ‘সাডেন  ইনফেন্ট  ডেথ  সিনড্রোম’  বা  শিশুর  হঠাৎ  মৃত্যু (SIDS-Sudden  Infant  Death  Syndrome)।  বেশ  কিছু  রোগের  হাত  থেকে  বাঁচার  জন্য  বা  রোগের  বিরুদ্ধে  শরীরে  প্রতিরোধ  শক্তি  সৃষ্টির  জন্য  আমরা  অনেকেই  এলোপ্যাথিক  টিকাগুলো  নিয়ে  থাকি।  যেমন-বিসিজি,  ডিপিটি,  এমএমআর,  হাম,  পোলিও,  হেপাটাইটিস,  এটিএস  ইত্যাদি।  অথচ  টিকার (vaccine)  মারাত্মক  ক্ষতিকর  দিক  সম্পর্কে  আমরা  অনেকেই  খবর  রাখি  না।  টিকার  ক্রিয়াকৌশল  হলো  অনেকটা  ‘কাটা  দিয়ে  কাটা  তোলা’  কিংবা  ‘চোর  ধরতে  চোর  নিয়োগ  দেওয়া’র  মতো।  যে  রোগের  টিকা  আমরা  নিয়ে  থাকি,  সেটি  বস্তুত  তৈরী  করা  হয়ে  থাকে  সেই  রোগেরই  জীবাণু  থেকে।  অর্থাৎ  যে  ব্যাকটেরিয়া  বা  ভাইরাস  যে-ই  রোগের  সৃষ্টি  করে  থাকে,  সেই  ব্যাকটেরিয়া  বা  ভাইরাস  থেকেই  সেই  রোগের  টিকা  প্রস্তুত  করা  হয়ে  থাকে।  সংশ্লিষ্ট  মারাত্মক  ব্যাকটেরিয়া  বা  ভাইরাসকে  নাকি  নানাবিধ  জটিল  প্রক্রিয়ার  মাধ্যমে  ‘দুর্বল’  করে  টিকা  হিসেবে  ব্যবহার  করা  হয়।  টিকা  মুখে  খাওয়ানো  হউক  বা  ইনজেকশনের  মাধ্যমে  দেওয়া  হউক,  সবগুলোই  এই  তথাকথিত  ‘দুর্বল’  কিন্তু  জীবিত  জীবাণু  দিয়ে  তৈরী  করা  হয়।  এসব  ভয়ানক  ক্ষতিকর  জীবাণুকে  ‘দুর্বল’  করার  প্রক্রিয়া  আবিষ্কার  করে  একই  সাথে  বিখ্যাত  এবং  পরবর্তীতে  কুখ্যাত  হয়েছিলেন  ফ্রান্সের  বিজ্ঞানী  লুই  পাস্তুর।  কেননা  লুই  পাস্তুরের  আবিষ্কৃত  জলাতঙ্কের  টিকা  নিয়েই  বরং  বিপুল  সংখ্যক  লোক  জলাতঙ্ক  রোগে  আক্রান্ত  হয়ে  মৃত্যুবরণ  করেছিল।  দাবী  করা  হয়ে  থাকে  যে,  জীবাণুদের  এই  ‘দুর্বলতা’  একটি  স্থায়ী  বিষয়;  কাজেই  তারা  কখনও  শক্তিশালী  হতে  পারে  না  এবং  কোন  ক্ষতি  করতে  পারে  না।  কিন্তু  নিরপেক্ষ  চিকিৎসা  বিজ্ঞানীরা  মনে  করেন  যে,  কারো  শরীরে  উপযুক্ত  পরিবেশ  পেলে  জীবাণুরা  ঠিকই  শক্তিশালী  হয়ে  উঠতে  পারে  এবং  ভয়ঙ্কর  ক্ষতিসাধন  করতে  পারে।  বাস্তবে  এমন  ভুড়িভুড়ি  প্রমাণ  পাওয়া  যায়।

আরেকটি  চিন্তার  কথা  হলো,  শক্তিশালী  কেউটে  সাপে  দংশন  করলে  মানুষ  মরবে  আর  দুর্বল  কেউটে  সাপে  কামড়ালে  মানুষ  মরবেও  না  আর  কোন  ক্ষতিও  হবে  না,  এমনটা  বলা  কতটা  যুক্তিসঙ্গত ?  দাবী  করা  হয়ে  থাকে  যে,  কোন  রোগের  টিকা  নিলে  শরীরে  সেই  রোগের  বিরুদ্ধে  একটি  ক্ষণস্থায়ী  প্রতিরোধ  শক্তির (antibody) সৃষ্টি  হয়;  ফলে  আগামী  কয়েক  বছর  সেই  ব্যক্তির  ঐ  রোগটি  হওয়ার  সম্ভাবনা  থাকে  না।  কিন্তু  এই  দাবীর  একশ  ভাগ  গ্যারান্টি  আজ  পর্যনত্ম  পাওয়া  যায়  নাই।  বোয়ার  যুদ্ধে  অংশগ্রহনকারী  অধিকাংশ  ব্রিটিশ  সৈন্যকে  টাইফয়েডের  টিকা  দেওয়া  হয়েছিল  কিন্তু  তারপরও  ৫১,০০০  সৈন্য  টাইফয়েডে  আক্রান্ত  হয়েছিল  যাদের  মধ্যে  ৮০০০  সৈন্য  মৃত্যুবরণ  করে।  অন্যদিকে  ইউরোপীয়  যুদ্ধের  সময়  রাশিয়া-জাপান  যুদ্ধের  অভিজ্ঞতা  অনুসারে  ওয়েস্টার্ন  ফ্রণ্টের  সৈন্যদেরকে  বিশুদ্ধ  পানি  সরবরাহ  এবং  পয়ঃনিষ্কাশন  ব্যবস্থার  উন্নয়ন  করা  হয়েছিল।  ফলে  টাইফয়েডে  আক্রান্ত  হয়েছিল  মাত্র  ৭০০০  সৈন্য  যাদের  অর্ধেক  ছিল  টাইফয়েডের  টিকা  নেওয়া  এবং  অর্ধেক  ছিল  টিকা  ছাড়া।  আবার  গেলিপোলির  যুদ্ধে  সমস্ত  সৈন্যকে  আমাশয়ের  টিকা  দেওয়ার  পরও  ৯৬,০০০  সৈন্য  আমাশয়ে  আক্রান্ত  হয়েছিল  কেবল  বিশুদ্ধ  পানি  সরবরাহ  করা  যায়নি  বলে।  ১৯৪৮  সালে  যুক্তরাজ্যে  বাধ্যতামূলক  বসন্তের  টিকা  নেওয়ার  আইনটি  যখন  বাতিল  করা  হয়;  তার  পরের  পরিসংখ্যানে  কিন্তু  যুক্তরাজ্যে  বসন্ত  মহামারীর  সংখ্যা  বা  বসন্ত  রোগে (small  pox)  মৃত্যুর  সংখ্যা  বৃদ্ধি  পেতে  দেখা  যায়নি।  মোটামুটি  সকল  টিকার  শিক্ষা  একটিই  আর  তাহলো  পুষ্টিকর  খাবার,  বিশুদ্ধ  পানি,  স্বাস্থ্যসম্মত  পয়ঃনিষ্কাশন  ব্যবস্থা,  স্বাস্থ্যসম্মত  জীবনযাপন,  স্বাস্থ্যকর  বাসস্থান  ইত্যাদির  অভাবকে  হাজারবার  টিকা  দিয়েও  সামলানো  যায়  না।  কিন্তু  সবচেয়ে  দুঃখজনক  বিষয়  হলো- শরীরে  রোগ  প্রতিরোধ  শক্তি  সৃষ্টি  করার  পাশাপাশি  টিকা  নামক  এই  জৈব  বিষ (Biological  poison)  অর্থাৎ  জীবাণু  মানুষের  রোগ  প্রতিরোধ  শক্তি  বা  ইমিউন  সিস্টেমে (immune  system)  মারাত্মক  বিশৃঙখলার  সৃষ্টি  করে  থাকে।  আর  এই  বিশৃঙখলার  সুযোগে  ক্যান্সারের  মতো  প্রাণঘাতী  রোগ  আমাদের  শরীরে  বাসা  বাধার  উপযুক্ত  পরিবেশ  পেয়ে  যায়।  ইহা  আজ  প্রমাণিত  সত্য  যে,  ইমিউনিটির  সর্বনাশ  না  হলে  শরীরে  ক্যান্সার  বা  ম্যালিগন্যান্সি (malignancy)  আসতে  পারে  না।  পৃথিবীতে  রোগ-ব্যাধিকে  যিনি  সবার  চাইতে  বেশী  বুঝতে  পেরেছিলেন,  সেই  চিকিৎসা  মহাবিজ্ঞানী  জার্মান  ডাঃ  স্যামুয়েল  হ্যানিম্যান  টিকাকে  অভিহিত  করেছেন – মানবজাতিকে  ধ্বংসের  একটি  ভয়ানক  মারনাস্ত্ররূপে।

টিকার  পার্শ্বপ্রতিক্রিয়া  বা  ক্ষতিকর  ক্রিয়া  এবং  তা  থেকে  মুক্তির  উপায়  নিয়ে  সর্বপ্রথম  এবং  সর্বাধিক  গবেষনা  করেছেন  ব্রিটিশ  হোমিও  চিকিৎসা  বিজ্ঞানী  ডাঃ  জে.  সি.  বার্র্নেট (Dr.  James  Compton  Burnett,  M.D.)।  ১৮৮০  সালে  তিনি  তাঁর  সুদীর্ঘ  ক্লিনিক্যাল  অবজার্বেশন  থেকে  ঘোষণা  করেন  যে,  টিউমার  এবং  ক্যান্সারের  একটি  অন্যতম  মূল  কারণ  হলো  এসব  টিকা।  বার্নেট  প্রথম  প্রমাণ  করেন  যে,  থুজা (Thuja  occidentalis)  নামক  হোমিও  ঔষধটি  টিকার  অধিকাংশ  ক্ষতিকর  পার্শ্বপ্রতিক্রিয়া  নিরাময়  করতে  সক্ষম।  বার্নেটের  মতে,  মানুষ  জন্মের  সময়  আল্লাহ  প্রদত্ত  যে  স্বাস্থ্য  নিয়ে  জন্মায়  তা  হলো  সবচেয়ে  উৎকৃষ্ঠ  স্বাস্থ্য (perfect  health)।  আর  এই  কারণে  টিকা  দিয়ে  বা  অন্য-কোন  ঔষধ  প্রয়োগে  তাকে  পরিবর্তন  করা  হলো  একটি  মাইনাস  পয়েন্ট  অর্থাৎ  সুস্বাস্থ্যের  ক্ষতি  করার  নামান্তর।  তার  মানে  হলো  টিকা  দেওয়ার  ফলে  একজন  মানুষ  তার  সবচেয়ে  উত্তম  স্বাস্থ্য  থেকে  বিচ্যুত/ অধঃপতন  হলো।  আর  সবচেয়ে  উৎকৃষ্ঠ  স্বাস্থ্য  থেকে  বিচ্যুত  হওয়ার  মানে  হলো  অসুস্থ্য  হওয়া।  কাজেই  টিকা  নেওয়ার  ফলে  শরীরের  যে  অবস্থা  হয়,  তাকে  সহজ  ভাষায়  বলা  যায়  অসুস্থ  অবস্থা  বা  রোগ  আক্রান্ত  অবস্থা  বা  পীড়াগ্রস্থ  হওয়া।  স্টুয়ার্ট  ক্লোজ (Dr.  Stuart  M  Close,  M.D.)  নামক  আরেকজন  ব্রিটিশ  চিকিৎসা  বিজ্ঞানী  টিকার  ন্যায়  যাবতীয়  পাইকারী  চিকিৎসাকে  সম্পূর্ণরূপে  ‘এক  পাক্ষিক  বা  এক  আঙ্গিক’ (unholistic)  ঘোষণা  করে  ইহার  নিন্দা  করেছেন ;  কেননা  ইহা  চিকিৎসা  বিজ্ঞানের  সংবেদনশীলতা (Susceptibility)  নামক  সার্বজনীন  নীতির  পরিপন্থী।  সাসসেপটিভিলিটি  নীতির  মানে  হলো  একই  ঔষধ  একজনের  উপকার  করতে  পারে,  আরেকজনের  ক্ষতি  করতে  পারে  আবার  অন্যজনের  উপকার-ক্ষতি  কোনটাই  নাও  করতে  পারে।

হ্যারিস  কালটার (Harris  Culter)  নামক  একজন  আমেরিকান  মেডিক্যাল  ঐতিহাসিক  তাঁর  দীঘ  গবেষণায়  প্রাপ্ত  তথ্য-উপাত্তের  ভিত্তিতে  এখনকার  সমাজে  মানসিক  রোগ  এবং  অপরাধ  প্রবনতা  বৃদ্ধির  জন্য  এবং  সামাজিক  মূল্যবোধের  অবক্ষয়ের  জন্য  টিকাদান  কর্মসূচীকে  দায়ী  করেছেন।  টিকা  কেবল  আমাদের  শরীরকে  নয়,  আমাদের  মনকেও  বিষিয়ে  তুলেছে।  মানুষের  মধ্যে  আজকাল  যে  উগ্রমেজাজ,  প্রতিশোধ  প্রবনতা,  অপরাধে  আসক্তি,  কথায়  কথায়  খুন  করার  মানসিকতা,  মাদকাসক্তি,  সমকামিতা,  আত্মহত্যার  প্রবনতা  প্রভৃতি  লক্ষ্য  করা  যায়  তারও  মূলে  রয়েছে  এই  কুলাঙ্গার  টিকা।  বিশেষত  বিসিজি  টিকা  শিশুদের  মনে  ধ্বংসাত্মক  প্রবণতা  সৃষ্টি  করে।  ইহার  ফলে  শিশুরা  এমন  দুর্দান্ত  স্বভাবের  হয়  যে,  তাদেরকে  শাসন  বা  নিয়নত্রণ  করা  অসম্ভব  হয়ে  পড়ে।  এরা  হয়  গোয়ার,  কথায়  কথায়  মারামারি  এবং  ভাঙচুড়ে  ওস্তাদ।  বর্তমানে  প্রচলিত  মারাত্মক  মারাত্মক  অনেক  চর্মরোগেরও  মূল  কারণ  এই  খতরনাক  টিকা।  একটি  ওয়েবসাইটে  টিকা  নেওয়ার  ফলে  শিশুদের  যে-সব  মারাত্মক  মারাত্মক  চর্মরোগ  হয়েছে,  তাদের  অনেকগুলো  ছবি  দেওয়া  আছে,  যা  দেখলে  যে-কেউ  শিউরে  উঠবেন।  সম্প্রতি  একটি  গবেষণায়  ঈঙ্গিত  করা  হয়েছে  যে,  একিউট  ডিজিজের ()  পরিমাণ  কমে  গিয়ে  এলার্জি,  হাঁপানি,  ডায়াবেটিস,  টিউমার,  ক্যান্সারের  মতো  দুরারোগ্য  ক্রনিক  ডিজিজের  সংখ্যা  মহামারী  আকারে  বৃদ্ধি  পাওয়ার  মূলে  আছে  এসব  পাইকারী  টিকাদান  কর্মসুচী।  কুলকান (Kulcan)  নামক  একজন  ব্রিটিশ  গবেষক  লক্ষ্য  করেন  যে,  মানুষের  চুল  টিকার  দ্বারা  সবচেয়ে  বেশী  ক্ষতিগ্রস্ত  হয়  থাকে।  টিকা  নেওয়ার  ফলে  কারো  কারো  চুল  পাতলা  হয়ে  যায়,  কারো  কারো  চুল  পড়ে  টাঁক  হয়ে  যায়  এবং  কারো  কারো  ক্ষেত্রে  অনাকাঙিখত  স্থানে  বেশী  বেশী  চুল  গজাতে  থাকে।  ডাঃ  বার্নেট  দীর্ঘ  গবেষণায়  প্রমাণ  করেছেন  যে,  টাক (Alopecia  areata)  পড়ার  মূল  কারণ  হলো  দাদ (Ringworm)  এবং  দাদের  মূল  কারণ  হলো  টিকা।  এই  কারণে  দেখা  যায়  শহরে  মানুষদের  মধ্যে  টাক  পড়ে  বেশী  এবং  গ্রামের  মানুষদের  মধ্যে  টাক  পড়ার  হার  খুবই  কম ;  কেননা  গ্রামের  লোকেরা  টিকা/ ভ্যাকসিন  তেমন  একটা  নেয়  না।  আমার  দ্বিতীয়  মেয়েটির  ঘটনা  মনে  আছে,  জন্মের  সময়  তার  মাথা  ভরা  চুল  ছিল  এবং  জন্মের  একমাস  পর  তাকে  এক  ডোজ  পোলিও  টিকার  খাওয়ানোর  পর  থেকে  দুই-তিন  মাসের  মধ্যেই  তার  চুল  পড়তে  পড়তে  অর্ধেক  মাথা  টাক  পড়ে  যায়।  তখন  আমি  টিকার  ক্ষতিকর  দিক  সম্পর্কে  কিছুই  জানতাম  না।  তারপর  তাকে  কয়েক  মাত্রা  থুজা  খাওয়ানোর  পর  আবার  ধীরে  ধীরে  চুল  গজাতে  শুরু  করে।

সম্প্রতি  ডাঃ  রিচার্ড  পিটকেয়ার্ন (Dr. Richard  Pitcairn)  নামক  একজন  চিকিৎসা  বিজ্ঞানী  আমেরিকার  গৃহপালিত  পোষা  প্রাণীদের  ওপর  গবেষণা  করে  দেখতে  পান  যে,  যেসব  পশুদের  টিকা  দেওয়া  হয়েছে  তদের  দাঁত  ক্ষয় (dental caries)  হয়  বেশী  বেশী।  আমেরিকানরা  কেবল  পাইকারী  হারে  টিকা  নিতেই  অভ্যস্থ  নয়  বরং  একই  সাথে  তাদের  গৃহপালিত  পোষা  প্রাণীদেরকেও  পাইকারী  হারে  টিকা  দিতে  ওস্তাদ।  আবার  একই  অবস্থা  দেখা  গেছে  মানুষের  ক্ষেত্রেও ;  টিকা  না  নেওয়া  শিশুদের  চাইতে  টিকা  নেওয়া  শিশুদের  দাঁত  ক্ষয়  হয়  বেশী  মাত্রায়।  এমনকি  গবেষণায়  দেখা  গেছে  যে,  টিকা  নেওয়া  শিশুদেরকে  যতই  পুষ্টিকর  খাবার  খাওয়ানো  হোক  না  কেন,  তাদের  দাঁত  ধ্বংস  হবেই  এবং  অধিকাংশ  ক্ষেত্রে  দাঁত  ক্ষয়  হয়  দাঁতের  বাহিরের  দিকে  মাড়ির  কাছাকাছি (neck  lesions)।  যেহেতু  দাঁতের  সাথে  হাড়ের  গঠনের  খুবই  ঘনিষ্ট  মিল  আছে ;  তাই  বলা  যায়  এসব  খতরনাক  টিকা  আমাদের  হাড়েরও  ক্ষতি  করে  থাকে  সমানভাবে।  আর  হাড়ের  ক্ষতি  হলে  শরীরে  রক্ত  কমে  যায় ;  কেননা  আমাদের  রক্ত  উৎপন্ন  হয়  হাড়ের  ভিতরে (bone marrow)।  আর  রক্ত  কমে  গেলে  বা  রক্তের  উৎপাদন  প্রক্রিয়ায়  কোন  ত্রুটি  দেখা  দিলে  মানুষ  অস্থিচমর্সার  বা  কঙ্কালে (emaciated)  পরিণত  হয়।  তাই  বলা  যায়,  ব্লাড  ক্যানসারেরও (blood  cancer)  একটি  বড়  কারণ  এসব  টিকা।  ডিপিটি  টিকার  কুফলে  আপনার  শিশুর  তাৎক্ষণিক  মৃত্যু  হতে  পারে  আবার  কোন  কোন  ক্ষেত্রে  শিশুর  ব্রেনও  ড্যামেজ  হয়ে  যেতে  পারে।  ফলে  সে  বুদ্ধিপ্রতিবন্ধি  বা  অটিজমের (Autism)  স্বীকার  হতে  পারে।  অবশ্য  অনেক  গবেষণায়  দেখা  গেছে  যে,  হাম (measles),  মাম্পস  বা  কণর্মূল  প্রদাহ (mumps),  হেপাটাইটিস  এবং  রুবেলা (rubella)  ভ্যাকসিনেরও  মানুষ  এবং  পোষাজন্তুদের  ব্রেন  ড্যামেজ  করার  ক্ষমতা  আছে।  বতমানে  বুদ্ধিপ্রতিবন্ধি  শিশুদের  সংখ্যা  এতো  বৃদ্ধি  পেয়েছে  যে,  সচেতন  ব্যক্তিরা  মানবজাতির  ভবিষ্যত  নিয়ে  শংকিত  হয়ে  পড়েছেন।  কেননা  ভবিষ্যৎ  পৃথিবীর  নেতৃত্ব  তো  আজকের  শিশুদেরকেই  নিতে  হবে।  শিশুদের  বুদ্ধিপ্রতিবন্ধিত্ব  বা  অটিজমে (Autism)  আক্রান্ত  হওয়ার  সবচেয়ে  বড়  কারণ  যে  এইসব  টিকা,  তা  অগণিত  গবেষণায়  প্রমাণিত  হয়েছে।  ইন্টারনেটে  সামান্য  খোজাঁখুঁজি  করলেই  এসব  টিকা  নেওয়ার  ফলে  অগণিত  শিশুর  করুণ  মৃত্যু,  ব্রেন  ড্যামেজ  হওয়া,  ক্যান্সার,  টিউমার,  ব্লাড  ক্যানসার  প্রভৃতি  মারাত্মক  রোগে  আক্রান্ত  হওয়ার  এমন  অগণিত  কেইস  হিস্ট্রি  দেখতে  পাবেন।

বিশ্ব  স্বাস্থ্য  সংস্থার  এক  জরিপে  দেখা  গেছে,  যে-সব  দেশে  টিকা  নেওয়ার  হার  বেশী,  সে  সব  দেশে  ক্যান্সারে  মৃত্যুর  হারও  বেশী।  শিশুকে  পোলিও  টিকা  খাওয়ানো  থেকে  স্বয়ং  তার  পিতা-মাতা  পোলিও  রোগে  আক্রান্ত  হতে  পারেন।  কেননা  পোলিও  টিকাতে  পোলিও  রোগের  জীবিত  ভাইরাস  থাকে  যা  অনেকদিন  পযর্ন্ত  শিশুর  মল-মুত্র-থুথু-কাশিতে  অবস’ান  করে।  এসময়  শিশুকে  চুমু  খেলে  বা  শিশুর  পায়খানা-প্রস্রাব  স্পর্শ  করার  মাধ্যমে  পিতা-মাতা-দাদা-দাদীও  পোলিও  রোগে  আক্রান্ত  হয়ে  পঙ্গু  হয়ে  যেতে  পারেন,  যদি  তাদের  শরীরে  পোলিও  রোগের  বিরুদ্ধে  প্রতিরোধ  শক্তি  বিদ্যমান  না  থাকে  বা  তাদের  রোগ  প্রতিরোধ  শক্তি  দুর্বল  হয়ে  থাকে।  হার্ভার্ড  মেডিকেল  স্কুলের  প্রফেসর  রোনাল্ড  ডেসরোজিয়ারের  মতে,  পোলিও  টিকাতে  আরেকটি  ভয়ঙ্কর  বিপদ  আছে  যা  ভবিষ্যতে  টাইম  বোমার  মতো  বিস্ফোণের  সৃষ্টি  করতে  পারে।  আর  তা  হলো  পোলিও  টিকা  তৈরীতে  বানরের  কিডনীর  টিস্যু  ব্যবহার  করা  হয়ে  থাকে।  ফলে  বানরদের  শরীরে  থাকা  মারাত্মক  সব  ভাইরাস  পোলিও  টিকার  মাধ্যমে  মানবজাতির  মধ্যে  ছড়িয়ে  পড়বে  যা  অকল্পনীয়  বিপর্যয়  ডেকে  আনবে।  ডেসরোজিয়ারের  মতে,  ‘আপনি  হয়ত  বলতে  পারেন  যে,  ভাইরাসমুক্ত  বানরের  টিস্যু  ব্যবহার  করলেই  হলো।  কিন্তু  সমস্যা  হলো  বানরের  শরীরে  থাকা  মাত্র  ২%  ভাইরাস  সম্পর্কে  মানুষ  অবহিত।  কাজেই  অবশিষ্ট  বিপুল  সংখ্যক  ভাইরাস  থেকে  ক্ষতির  আশংকা  থেকেই  যায়’।  ১৯৫৯  সালে  বহুজাতিক  ঔষধ  কোম্পানির  মার্ক-এর  বেন  সুইট  নামক  এক  বিজ্ঞানী  পোলিও  টিকাতে  এসভি-৪০  নামক  বানরের  নতুন  একটি  ভাইরাস  সনাক্ত  করেন  যেই  ব্যাচের  টিকা  পূর্ববর্তী  পাঁচ  বছরে  মার্কিন  যুক্তরাষ্ট্রের  কোটি  কোটি  শিশুকে  খাওয়ানো  হয়েছিল।  গবেষনায়  যখন  প্রমাণিত  হয়  যে,  এসভি-৪০  একটি  ক্যান্সার  সৃষ্টিকারী  এজেন্ট  যা  গিনিপিগের  শরীরে  টিউমার  তৈরী  করেছে;  তখন  সারা  আমেরিকায়  হৈচৈ  পড়ে  যায়।  তারপর  যুক্তরাষ্ট্র  সরকার  এবং  টিকা  প্রস্তুতকারী  কোম্পানি  সিদ্ধান্ত  নেয়  যে,  এখন  থেকে  পোলিও  টিকা  তৈরীতে  অন্য  প্রজাতির  বানরের  কোষতন্তু (tissue)  ব্যবহার  করা  হবে।

পরবর্তী  গবেষণায়  দেখা  গেছে  যে,  এসভি-৪০  ভাইরাস  কেবল  পোলিও  টিকা  গ্রহনকারীদের  শরীরেই  নানা  রকম  ক্যান্সারের  সৃষ্টি  করে  না,  বরং  তাদের  সন্তানদের  দেহেও  ক্যান্সার  সৃষ্টি  করতে  সক্ষম।  ইউনিভার্সিটি  অব  সাউদার্ন  ক্যালিফোর্নিয়ার  প্যাথলজীর  প্রফেসর  বিজ্ঞানী  জন  মার্টিন  সিমিয়ান  সাইটোমেগালোভাইরাস (SCMV)  নামক  একটি  বানরের  ভাইরাস  নিয়ে  গবেষণায়  দেখেছেন  যে,  এটি  মানুষের  ব্রেনে  ছোট-বড়  নিউরোলজিক্যাল  সমস্যার  সৃষ্টি  করতে  সক্ষম।  শিকাগোর  লয়ালা  ইউনিভার্সিটি  মেডিকেল  সেন্টারের  মলিকুলার  প্যাথলজিষ্ট  মিশেল  কার্বন  একই  ধরণের  টিউমার  মানুষের  মধ্যে  দেখতে  পেয়েছেন  যেমনটা  এসভি-৪০  ভাইরাস  গিনিপিগের  শরীরে  তৈরী  করেছিল।  তিনি  ৬০%  ফুসফুসের  ক্যান্সারে এবং  ৩৮%  হাড়ের  ক্যান্সারে  এসভি-৪০  ভাইরাসের  জিন  এবং  প্রোটিন  আবিষ্কার  করেন।  তিনি  একটি  মেডিকেল  কনফারেন্সে  এসভি-৪০  ভাইরাসের  সাথে  এসব  ক্যান্সারের  সম্পর্কের  বিষয়টি  আরো  পরিষ্কারভাবে  নিশ্চিত  করেন।  তার  সর্বশেষ  গবেষণায়  এসভি-৪০  ভাইরাস  কিভাবে  একটি  কোষকে  ক্যান্সারে  রূপান্তরিত  করে  তার  মেকানিজম  আবিষ্কার  এবং  বর্ণনা  করেন।  মিশেল  কার্বনের  গবেষণায়  দেখা  যায়  যে,  এসভি-৪০  ভাইরাসটি  একটি  প্রোটিনকে  বিকল  করে  দিয়ে  থাকে  যা  কোষকে  ক্যান্সারে  পরিণত  হওয়া  থেকে  রক্ষা  করে।  কাজেই  কারো  কারো  মধ্যে  ব্রেন,  হাড়  এবং  ফুসফুসে  টিউমার  সৃষ্টিতে  এসভি-৪০  ভাইরাস  একটি  উপাদানরূপে  কাজ  করতে  পারে।  ব্রিটিশ  মেডিকেল  জার্নালে  প্রকাশিত  একটি  গবেষণায়  দেখা  যে,  পোলিও  টিকা  খাওয়ার  পর  ত্রিশ  দিনের  মধ্যে  যদি  কোন  শিশু  অন্য  কোন  ইনজেকশন  নেয়,  তবে  তার  প্যারালাইসিস  এবং  পোলিওমায়েলাইটিসে  আক্রান্ত  হয়ে  পঙ্গু  হওয়ার  সম্ভাবনা  আছে।  এই  বিষয়টি  কয়েক  বছর  পুর্বে  ওমানে  প্রমাণিত  হয়েছে,  যেখানে  পোলিও  টিকা  খাওয়ার  পরে  ডি.পি.টি.  ইনজেকশন  নেওয়া  বিপুল  সংখ্যক  শিশু  প্যারাইসিসে  আক্রান্ত  হয়েছিল।  কেন  এমনটা  হয়  সে  সম্পর্কে  বিজ্ঞানীরা  কোন  রহস্য  কিনারা  করতে  পারেনি।

ইটালীর  ইউনিভার্সিটি  অব  ফেরারা’র  জেনেটিক্সের  প্রফেসর  মওরো  টগনন  গত  বিশ  বছরে  যুক্তরাষ্ট্রে  ব্রেন  টিউমারের  সংখ্যা  ৩০%  বৃদ্ধি  পাওয়ার  একটি  সম্ভাব্য  কারণরূপে  মনে  করেন  পোলিও  টিকার  মাধ্যমে  ছড়ানো  এসভি-৪০  ভাইরাসকে।  আমেরিকার  মেডিক্যাল  জার্নালে  প্রকাশিত  ইটালীর  এক  ক্যান্সার  গবেষণার  ফলাফলে  সুপারিশ  করা  হয়েছে  যে,  বর্তমানে  তিন  ধরনের  ক্যান্সারের  আক্রমণের  হার  বৃদ্ধি  পাওয়ার  কারণ  হলো  বানরের  এসভি-৪০  ভাইরাস  পোলিও  টিকার  মাধ্যমে  মানবজাতির  মধ্যে  ছড়িয়ে  পড়া ;  যা  বর্তমানে  যৌনমিলনের  মাধ্যমে  পুরুষ  থেকে  নারীতে  এবং  বংশ  পরস্পরায়  মা  থেকে  গর্ভস্থ  শিশুতে  বিস্তার  লাভ  করছে।  চিকিৎসা  বিজ্ঞানীদের  একাংশ  মনে  করেন,  পোলিও  টিকার  মাধ্যমেই  এইডস  রোগের  ভাইরাস  বানরদের  শরীর  থেকে  মানবজাতির  মধ্যে  সংক্রমিত  হয়েছে।  ন্যাশনাল  ইনিস্টিটিউট  অব  হেলথের  গবেষক  এবং  জেনেটিক্স  বিজ্ঞানী  মার্ক  গীয়ার  বলেন  যে,  “সকলের  সামনে  টিকার  ক্ষতিকর  পার্শ্ব-প্রতিক্রিয়া  নিয়ে  আলোচনা  করলে  বা  টিকা  নিয়ে  ক্ষতিগ্রস্ত  শিশুদের  সম্পর্কে  কথা  বললে  অন্যান্য  ডাক্তাররা  প্রচুর  সমালোচনা  করে  থাকে।  কিন্তু  একই  ডাক্তাররা  আবার  গোপনে  স্বীকার  করেন  যে,  টিকা  সম্পর্কে  তুমি  যা  বলেছ  তা  ঠিক  আছে।  তবে  এসব  সবাইকে  বলতে  থাকলে  লোকেরা  ভয়ে  টিকা  নেওয়া  বন্ধ  করে  দিবে”।  তার  মতে,  চিকিৎসকদের  এই  ধরণের  মনোভাব  খুবই  দুঃখজনক।

ল্যাবরেটরী  এক্সপেরিমেন্ট  এবং  ক্লিনিক্যাল  অবজারবেশনের  মাধ্যমে  বিভিন্ন  টিকার  সাথে  আরো  অনেক  মারাত্মক  মারাত্মক  রোগের  সম্পর্কের  প্রমাণ  পাওয়া  গেছে।  যেমন- ডিপিটি  টিকার  সাথে  এনাফাইলেকটিক  শক (Anaphylactic  shock)  বা  হঠাৎ  মৃত্যু,  এনসেফালোপ্যাথি (Encephalopathy)  ব্রেনের  ইনফেকশন,  গুলেন  বেরি  সিনড্রোম (Guillain-Barré  Syndrome),  ডিমায়েলিনেটিং  ডিজিজেজ  অব  সেন্ট্রাল  নার্ভাস  সিস্টেম  ইত্যাদি।  হামের  টিকার  সাথে  অপটিক  নিউরাইটিস (Optic  neuritis)  দৃষ্টিশক্তির  গোলমাল,  মৃগীরোগ (Epilepsy),  গুলেন-বেরি  সিনড্রোম,  ট্রান্সভার্স  মায়েলাইটিস (Transverse  myelitis),  মৃত্যু  ইত্যাদি।  হেপাটাইটিস  বি  টিকা  থেকে  গুলেন-বেরি  সিনড্রোম,  আথ্রাইটিস (Arthritis),  ডিমায়েলিনেটিং  ডিজিজেজ  অব  সেন্ট্রাল  নার্ভাস  সিস্টেম  ইত্যাদি  হতে  পারে।  সবচেয়ে  বড়  বিপদের  কথা  হলো,  একই  ব্যক্তি  একসাথে  অনেকগুলো  টিকা  নিলে  তাদের  পারস্পরিক  বিক্রিয়ার  কারণে  আমাদের  কি  ধরণের  ক্ষতি  হবে  পারে,  সে  সম্পকে  আমরা  কিছুই  জানি  না।  হোমিও  চিকিৎসা  বিজ্ঞানী  এবং  হোমিও  ডাক্তাররা  শত  বষ  পূব  থেকেই  এসব  টিকাদান  কমসূচীর  বিরোধিতা  করে  আসছেন।  ব্রিটিশ  সোসাইটি  অব  হোমিওপ্যাথ-এর  দুই  হাজার  সদস্য  রয়েছেন,  যাদের  কেউ  টিকা  সমর্থন  করেন  না।  এমনকি  যে-সব  বিজ্ঞানী  এসব  টিকা  আবিষ্কার  করেছিলেন,  তারাও  কোন  রকম  মহামারী  ছাড়াই  বিনা  প্রয়োজনে  এসব  টিকা  পাইকারী  হারে  সবাইকে  দেওয়ার  সুপারিশ  করেন  নাই।  কিন্তু  পরবতীতে  এটি  একটি  বিরাট  লাভজনক  ব্যবসায়ে  পরিণত  হয়েছে।

পরিসংখ্যানে  দেখা  গেছে  যে,  ১৯৬৮  হামের  টিকা  চালূ  হওয়ার  বহু  পূর্বেই  হামে (measles)  মৃত্যুর  হার  ৯৯.৪  ভাগ  হ্রাস  পেয়েছিল।  কাজেই  বলা  যায়  যে,  হামের  মৃত্যু  কমাতে  হামের  টিকার  কোন  অবদান  নাই।  অথচ  এখনও  অভিভাবকদের  বিশ্বাস  করতে  প্ররোচিত  করা  হয়  যে,  হামের  টিকার  কারণে  এই  রোগে  শিশু  মৃত্যুর  হার  এখন  অনেক  কম !  ২০০৮  সালে  ভারতের  চেন্নাই  এবং  তামিলনাড়ু  প্রদেশে  হামের  টিকা  নিয়ে  অসংখ্য  শিশুর  মৃত্যুর  ঘটনায়  সরকারীভাবে  নিষিদ্ধ  করা  হয়েছে  এবং  সাংবাদিকদের  মতে,  পযায়র্ক্রমে  হয়ত  ভারতের  সকল  প্রদেশেই  হামের  টিকাদান  কর্মসূচী  বন্ধ  করা  হতে  পারে।  আফ্রিকার  একটি  দেশ  উগান্ডায়  পোলিও  ভ্যাকসিন  খেয়ে  এত  বেশী  শিশু  মৃত্যুবরণ  করেছে  যে,  তাকে  স্রেফ  গণহত্যা  বলে  অভিহিত  করা  যায়।  কিহুরা  কি‌উবা (Kihura Nkuba)  নামক  তথাকার  একজন  ধর্মযাজক  সাংবাদিকদের  বলেন  যে,  এসব  হতভাগ্য  শিশুদের  জানাযা  পড়তে  পড়তে  তার  নুতন  কুর্তা  পুরনো  হয়ে  ছিড়ে  গেছে।  তিনি  এক  মহিলার  ঘটনা  উল্লেখ  করেন,  যে  কিনা  পোলিও  টিকা  খাওয়ানোর  সরকারী  নির্দেশ  পেয়ে  তার  চার  শিশু  সন্তানের  মধ্যে  একটিকে  লুকিয়ে  রেখেছিলেন  এবং  তিনটিকে  পোলিও  টিকা  খাইয়েছিলেন।  ফলে  সেই  একটিই  বেচেঁছিল  এবং  বাকী  তিনটি  মৃত্যুর  কোলে  ঢলে  পড়ে।  বিবেকবান  চিকিৎসা  বিজ্ঞানীদের  মতে,  এই  পাইকারী  টিকাদান  কর্মসূচী  হলো  একটি  মেডিক্যাল  টাইম  বোমা (time bomb)  যা  খুব  শীঘ্রই  ফাটবে  এবং  তখন  মানবজাতির  অস্তিত্ব  নিয়ে  টানাটানি  শুরু  হবে।  আসলে  কথাটা  ভুল  বললাম ;  টাইমবোমাটির  আসলে  অলরেডি  বিস্ফোরণ (burst)  হয়ে  গেছে।  এলার্জি,  হাঁপানি,  ডায়াবেটিস,  যক্ষ্মা,  বুদ্ধি  প্রতিবন্দ্বি,  টিউমার,  ক্যানসার  ইত্যাদি  মারাত্মক  মারাত্মক  রোগসমূহ  আজ  ঘরে  ঘরে  এমনভাবে  আক্রমণ  করেছে  যে,  আর  কিছুদিন  পরে  অবস্থাটা  কোথায়  গিয়ে  দাঁড়াবে  ভাবতেই  গা  শিউরে  উঠে।

সাম্রাজ্যবাদীদের  বিভিন্ন  পিলে  চমকানো  চক্রান্ত  সম্পর্কে  যারা  খোঁজ-খরব  রাখেন,  তাদের  কথা  শোনলে  মনে  আরো  ভীতির  সৃষ্টি  হয়।  অস্ত্র  উৎপাদনকারী  দেশ  এবং  কোম্পানীগুলো  যেমন  অস্ত্র  বিক্রির  জন্য  বিভিন্ন  দেশে  যুদ্ধ-গৃহযুদ্ধ  লাগিয়ে  দেয়।  তেমনি  বড়  বড়  ঔষধ  কোম্পানীগুলো  তাদের  ঔষধ  বিক্রি  করে  টাকার  পাহাড়  গড়ার  জন্য  প্রথমে  নিজেরাই  নাকি  প্রথমে  মানুষের  মধ্যে  রোগের  সৃষ্টি  করার  ব্যবস্থা  করে  থাকে।  এজন্য  তারা  বিভিন্ন  দেশ-মহাদেশের  জন্য  রোগ  নির্দিষ্ট  করে  নেয়।  যেমন-  এশিয়ার  জন্য  ক্যানসার,  আফ্রিকার  জন্য  এইডস,  ইউরোপের  জন্য  মানসিক  রোগ,  আমেরিকার  জন্য  হৃদরোগ,  অস্ট্রেলিয়ার  জন্য  মেদভূড়ি  ইত্যাদি  ইত্যাদি।  তারপর  টিকার  সাথে  বিভিন্ন  বিষাক্ত  পদার্থ  মিশিয়ে  এইসব  রোগ  মানুষের  মধ্যে  সৃষ্টি  করা  হয়।  গবেষকদের  মতে,  পোলিও  টিকার  ভেতরে  এইডসের  জীবাণু  মিশিয়ে  দিয়ে  তারপর  সেগুলো  (অনেক  ক্ষেত্রে  বিনামূল্যে)  আফ্রিকার  বিভিন্ন  সরবরাহ  করে  সেখানে  এইডসের  মহামারী  সৃষ্টি  করেছে।  পাশাপাশি  সাম্রাজ্যবাদীরা  আফ্রিকার  অনেকগুলো  দেশের  মধ্যে  যুদ্ধ  এবং  গৃহযুদ্ধ  লাগিয়ে  দিয়েছে।  তারপর  সাম্রাজ্যবাদীরা  আফ্রিকার  স্বর্ণ,  হীরা,  অন্যান্য  মূল্যবান  খনিজ  সম্পদ  অল্পমূল্যে  (ক্ষেত্র  বিশেষে  বিনামূল্যে)  লুন্ঠন  করে  নিজেরা  সম্পদের  পাহাড়  গড়ে  তুলছে।  অন্যদিকে  এতো  এতো  মূল্যবান  প্রাকৃতিক  এবং  খনিজ  সম্পদের  মালিক  হয়েও  আফ্রিকানরা  এইডস  এবং  যুদ্ধে  ছোবলে  ক্ষত-বিক্ষত  হয়ে  অনাহারে  এবং  বিনা  চিকিৎসায়  ধুকে  ধুকে  মরছে।  তাদের  যাকিছু  আয়-উপার্জন  তা  এইডসের  ঔষধ  এবং  যুদ্ধের  অস্ত্র  কিনতেই  শেষ  হয়ে  যাচ্ছে।  যেই  ঔষধে  এইডস  সারে  না,  সেই  ঔষধই  তাদেরকে  খুবই  উচ্চ  মূল্যে  কিনতে  হচ্ছে।

টিকার  ক্ষতিকর  দিক  নিয়ে  প্রচুর  গবেষণা  এবং  লেখালেখি  করেছেন  এমন  একজন  ভারতীয়  গবেষক  শ্রী  জগন্নাথ  চ্যাটাজির  মতে,  “একজন  মানুষের  জীবনকে  তছনছ/ ছাড়খার  করার  জন্য  মাত্র  একডোজ  টিকাই  যথেষ্ট”।  তার  এই  কথাটি  যে  কতটা  নিদারুণ  নিমর্ম  সত্য  কথা,  তার  সাক্ষী  আমি  নিজে  এবং  আমার  মতো  আরো  কোটি  কোটি  আদম  সন্তান।  আজ  থেকে  কুড়ি  বছর  আগে  আমার  এক  আত্মীয়ের  যক্ষ্মা  হয়েছে  শুনে  একজন  এলোপ্যাথিক  ডাক্তার  আমাকে  একডোজ  বি.সি.জি.  টিকা  নেওয়ার  পরামর্শ  দেন।  আর  বি.সি.জি.  টিকা  নেওয়ার  কারণে  সেখানে  এমন  ঘা/ ক্ষত  হয়  যে,  সেটি  শুকাতে  প্রায়  এক  বছর  লেগে  যায়  এবং  ডান  হাতের  সেই  মাংস  পেশীটি (deltoid  muscle)  পুরোপুরি  ধ্বংস  হয়ে  যায়।  ফলে  আজ  বিশ  বছর  হলো  ডান  হাতে  আমি  কোন  শক্ত  কাজ  করতে  পারি  না ;  এমনকি  কমপিউটারের  মাউস  নিয়ে  চাপাচাপি  করা (যা  পৃথিবীর  সবচেয়ে  হালকা  কাজ),  তাও  বেশীক্ষণ  করতে  পারি  না।  বেশী  কাজ  করতে  গেলেই  হাতের  জয়েন্টে  ব্যথা  শুরু  হয়,  হাত  অবশ  হয়ে  আসে।  অথচ  প্রতিটি  মানুষের  জীবনে  তার  ডান  হাতের  গুরুত্ব  কতো  বেশী,  তা  আমরা  সবাই  জানি।  বিশেষ  করে  যাদের  লেখালেখি  বেশী  করতে  হয়,  তাদের  তো  কথাই  নেই।  শুধু  তাই  নয়,  বি.সি.জি.  টিকা  নেওয়ার  কারণে  আমার  স্বাস্থ্য  এমনভাবে  ভেঙে  পড়ে  যে,  আজ  কুড়ি  বছর  যাবৎ  আমি  কঙ্কালসারে  পরিণত  হয়ে  আছি।  আরো  পঞ্চাশ  বছর  সাধনা  করেও  আমার  হারানো  স্বাস্থ্য  ফিরে  পাওয়ার  কোন  সম্ভাবনাও  দেখছি  না।

যদিও  দাবী  করা  হয়ে  থাকে  যে,  আজ  থেকে  একশ  বছর  পূর্বে  যখন  পাইকারী  টিকাদান  কর্মসূচী  শুরু  করা  হয়,  তখন  থেকেই  প্রচলিত  সংক্রামক  ব্যাধিসমূহ  ধীরে  ধীরে  বিলুপ্ত  হতে  থাকে।  কিন্তু  ব্রিটিশ  এবং  আমেরিকান  তৎকালীন  মেডিকেল  পরিসংখ্যানে  দেখা  যায়  যে,  ডিপথেরিয়া,  যক্ষা  এবং  হুপিং  কাশি  টিকা  আবিষ্কারের  পূর্বেই  আক্ষরিক  অর্থে  বিলুপ্ত  হয়ে  গিয়েছিল।  চিকিৎসা  বিজ্ঞানীদের  মতে,  টিকার  কারণে  নয়  বরং  বিশুদ্ধ  পানি  সরবরাহ,  পয়ঃনিষ্কাশন  প্রণালীর  উন্নতি,  খাদ্য  পুষ্টিমানের  উন্নতি,  স্বাস্থ্যসম্মত  বাসস্থান  এবং  জন্মনিয়ন্ত্রণের  কারণে  এসব  সংক্রামক  ব্যাধি  ধীরে  ধীরে  বিলুপ্ত  হয়ে  গেছে।  শিল্পোন্নত  দেশগুলি  তাদের  আবিষ্কৃত  ঔষধ  নিজেরা  ব্যবহারের  পূর্বে  প্রথমে  আমাদের  মতো  দরিদ্র-অশিক্ষা  জর্জড়িত  দেশে  অল্পমূল্যে  বা  ক্ষেত্রবিশেষে  বিনামূল্যে  পাঠিয়ে  দেয়  পরীক্ষা-নিরীক্ষার  জন্য। এই  উদ্দেশ্যে  তারা  জাতিসংঘকে  ব্যবহার  করে  তাদের  ধামাধরা  হিসাবে।  তাদের  কাছে  আমরা  হলাম  গিনিপিগ  বা  গবাদিপশুতুল্য।  আমাদের  ওপর  দশ-বিশ  বছর  পরীক্ষার  পরে  যখন  নিশ্চিত  হওয়া  যায়  যে,  সংশ্লিষ্ট  ঔষধটির  তেমন  কোন  মারাত্মক  ক্ষতিকর  প্রভাব  নেই,  তখনই  সেটি  উন্নত  দেশের  লোকেরা  ব্যবহার  করতে  শুরু  করে।  এই  কারণে  বাজারে  আসা  সমস্ত  নতুন  ঔষধ  থেকে  সযত্নে  দুরে  থাকা  কর্তব্য।  শ্রী  রাজাজি  নামক  একজন  ভারতীয়  চিকিৎসক  একটি  মেয়ের  ঘটনা  বর্ণনা  করেন,  যে  বিসিজি  টিকা  নিয়ে  অন্ধ  হয়ে  গিয়েছিল  এবং  অন্য  দুইজনের  উল্লেখ  করেছেন  যারা  বিসিজি  নেওয়ার  পরে  মৃত্যুবরণ  করে।  আর  টিকার  ক্ষতিকর  দিক  সম্পর্কে  গত  একশ  বছরের  সকল  গবেষণার  প্রতি  যদি  আপনি  লক্ষ্য  করেনতবে  দেখতে  পাবেন  এদের  সবচেয়ে  বড়  অংশটি  দখল  করে  আছে  ব্রেনের (brain)  রোগসমূহ।  অর্থাৎ  ভ্যাকসিন  থেকে  সবচেয়ে  বেশী  ক্ষতিগ্রস্ত  হওয়া  অঙ্গটি  হলো  ব্রেন / মস্তিষ্ক  বা  সেন্ট্রাল  নার্ভাস  সিস্টেম (central  nervous  system)।  আর  ব্রেন  ক্ষতিগ্রস্ত  হলে  আপনি  যে-সব  রোগে  আক্রান্ত  হতে  পারেনসেগুলো  হলো  ব্রেন  টিউমারঅটিজম (বুদ্ধিপ্রতিবন্দ্বি)ব্রেন  ড্যামেজমৃগীরোগ (epilepsy)মাইগ্রেন (migraine)বিষন্নতা (depression)খুন  করার  প্রবনতা (killing  instinct)গুলেন-বেরি  সিনড্রোম (Guillain  barré  syndrome)যৌন  ক্ষমতা  বিনষ্ট  হওয়া (impotancy)ভাইরাস  এনসেফালাইটিস (viral  encephalities)অন্ধত্ববিভিন্ন  ধরনের  মানসিক  রোগস্মরণশক্তি  নষ্ট  হওয়া  ইত্যাদি  ইত্যাদি

আরেকটি  সমস্যা  হলো,  কোটি  কোটি  ইউনিট  টিকা  উৎপাদনের  সময়  যান্ত্র্রিক  ত্রুটির  কারণে  অনেকগুলিতে  রোগ  সৃষ্টিতে  সক্ষম  এমন  শক্তিশালী  জীবাণু  থেকে  যাওয়াও  বিচিত্র  কিছু  নয়।  তেমনি  একটি  ঘটনায়  গত  বৎসর  ভারতের  মেঘালয়  প্রদেশে  এগার  হাজার  শিশুর  মৃত্যু  হলে  ভারত  সরকার  ইউনিসেফের  বিরুদ্ধে  আনত্মর্জাতিক  আদালতে  মামলা  দায়ের  করে।  ভিয়েনা  ভিত্তিক  একটি  অলাভজনক  প্রতিষ্টান  ‘ন্যাশান্যাল  ভ্যাকসিন  ইনফরমেশন  সেন্টার’  (যারা  টিকার  ক্ষতিকর  ক্রিয়া  সমপর্কে  গবেষনা  করে)-এর  মতে,  টিকা  নেওয়ার  কারণে  শিশুদের  হঠাৎ  মৃত্যুর  সংখ্যা  প্রতি  দশ  লাখে  একটি  এবং  শিশুদের  ব্রেন  ড্যামেজের  হার  প্রতি  ষিষট্টি  হাজারে  একটি।  তবে  বিশেষজ্ঞদের  মতে,  বাস্তব  সংখ্যা  তার  চাইতেও  অনেক  অনেক  বেশী  হওয়াটা  স্বাভাবিক।  কারণ  টিকা  নেওয়ার  কারণে  মৃত্যুবরণ  করা  অথবা  অন্য  কোন  মারাত্মক  রোগে  আক্রান্ত  হওয়া  শিশুদের  অনেক  পিতা-মাতা  অজ্ঞতার  কারণে  বিষয়টি  বুঝতেও  পারেন  না  এবং  স্থানীয়  স্বাস্থ্য  বিভাগে  অথবা  সংবাদপত্রে  রিপোর্ট  করেন  না (এবং  দারিদ্রের  কারণেও  এমনটা  ঘটে  থাকে)।  যুক্তরাষ্ট্রের  অফিসিয়াল  রেকর্ডে  দেখা  যায়  যে,  টিকা  নেওয়ার  কারণে  প্রতি  সপ্তাহে  অন্তত  একটি  শিশুর  মৃত্যু  হয়ে  থাকে  এবং  ডাক্তাররা  স্বীকার  করেছেন  যে,  টিকার  মাধ্যমে  সিফিলিস  রোগ  ছড়ানোর  সম্ভাবনা  রয়েছে।  তাছাড়া  টিকা  দেওয়ার  পরে  অনেক  শিশুই  প্রচণ্ড  জ্বরে  আক্রান্ত  হয়ে  থাকে  এবং  এসব  পরিস্থিতিতে  পিতা-মাতার  অবহেলায়  শিশুদের  মৃত্যুর  ঘটনা  হরহামেশা  প্রত্রিকায়  দেখা  যায়।  হ্যাঁ,  ক্রটিযুক্ত  টিকা  বা  টিকা  প্রয়োগজনিত  ক্রটির  কারণে  আপনার  প্রাণপ্রিয়  সন্তান  চিরদিনের  জন্য  পঙ্গু  হয়ে  যেতে  পারে।  অজ্ঞতার  কারণে  এক  সময়  অনেক  দেশেই  টিকা  নেওয়া  বাধ্যতামূলক  করা  হয়েছিল।  কিন্তু  চিকিৎসাবিজ্ঞানের  উন্নতির  সাথে  সাথে  সে  অবস্থা  এখন  আর  নেই।  কাজেই  বর্তমানে  অভিবাবকদের  উচিত  প্রতিটি  বিষয়ের  ভাল-মন্দ  জেনে-শুনে  তবেই  সিদ্ধান্ত  নেওয়া।  শিশুদের  পাইকারী  হারে  টিকা  দেওয়ার  এই  রমরমা  অবস্থার  পেছনের  কারণ  সম্পূর্ণই  বাণিজ্য  অর্থাৎ  মালের  ধান্ধা।  যে-সব  দেশে  এসব  টিকা  তৈরী  হয়,  সে-সব  দেশের  সরকারসমূহ  প্রতি  বছর  এসব  টিকা  কোম্পানীগুলোর  কাছ  থেকে  বিলিয়ন  বিলিয়ন  ডলার  ট্যাক্স  পেয়ে  থাকে।

ফলে  চিকিৎসাবিজ্ঞানীরা  টিকার  বিভিন্ন  ক্ষতিকর  দিক  নিয়ে  হৈচৈ  করলেও  ডলারের  লোভে  সরকারগুলো  টিকা  কোম্পানীর  বিরুদ্ধে  কোন  ব্যবস্থা  নেয়  না।  এসব  টিকা  কোম্পানীগুলো  রাজনীতিবিদ,  ডাক্তার,  শিশু  বিশেষজ্ঞ,  সরকারের  স্বাস্থ্য  বিভাগের  আমলাদের  নানা  রকম  আর্থিক  সুযোগ-সুবিধা  দিয়ে  হাত  করে  থাকে।  সরকারী  ডাক্তাররা  অনেক  ক্ষেত্রে  এসব  পাইকারী  টিকাদান  কর্মসূচীতে  আগ্রহী  না  হলেও  কোন  কোন  ক্ষেত্রে  রাজনৈতিক  নেতাদের  চাপে  বাধ্য  হয়ে  করতে  হয়।  রাজনৈতিক  নেতৃবৃন্দ  পাইকারী  টিকা  কর্মসূচীর  মাধ্যমে  অজ্ঞ  জনসাধারণকে  বুঝানোর  চেষ্টা  করে  যে,  তাদের  দল  জনগণের  কল্যাণের (?)  জন্য  যথাসাধ্য  চেষ্টা-তদ্বির  করে  যাচ্ছে।  মার্কিন  যুক্তরাষ্ট্রের  স্বাস্থ্য  বিভাগের  ডাক্তার  এবং  আমলারা  টিকা  কোমপানীর  কাছ  থেকে  ঘুষ  খেয়ে  সেখানে  শিশুদের  টিকা  নেওয়া  বাধ্যতামুলক  করে  আইন  পাশ  করিয়েছে।  তারপরও  সেখানে  অনেকে  আদালতের  অনুমতি  নিয়ে  নিজেদের  শিশুদের  টিকা  থেকে  দুরে  রাখেন।  যেহেতু  টিকা  তৈরীতে  বানর,  শুকর,  ইদুর,  গিনিপিগ  ইত্যাদি  প্রাণীর  রক্ত,  মাংস  ব্যবহৃত  হয়,  এজন্য  অনেক  বিজ্ঞ  আলেম  মুসলমানদের  জন্য  টিকা  নেওয়া  হারাম  ঘোষণা  করে  ফতোয়া  দিয়ে  থাকেন।  টিকা  কোমপানির  কাছ  থেকে  আমেরিকান  শিশু  বিশেষজ্ঞরা  যে  বিপুল  পরিমান  কমিশন  পান,  তার  লোভে  জোর  করে  শিশুদের  টিকা  দেওয়ার  চেষ্টা  করেন  এবং  টিকা  না  নেওয়া  শিশুরা  কোন  রোগে  আক্রান্ত  হলে  তাদেরকে  চিকিৎসা  করতে  অস্বীকার  করেন।  এজন্য  শিশুদের  সাথে  এবং  তাদের  অভিভাবকদের  সাথে  বর্বর  আচরণ  করতেও  দ্বিধা  করেন  না।  ফলে  বিবেকবান  লোকেরা  এটিকে  চিকিৎসার  নামে  স্বৈরতন্ত্র  হিসেবে  অভিহিত  করেন।  এই  কারণে  ঐসব  শিশুরা  সেখানকার  হোমিওপ্যাথিক,  ন্যাচারোপ্যাথিক,  ইউনানী  প্রভৃতি  চিকিৎসকদের  অধীনে  চিকিৎসা  নিয়ে  বেশ  ভালই  থাকেন।  টিকা  কোমপানি  এবং  তাদের  দালালদের  এসব  অমানবিক  আচরণ  ইদানীং  সেখানে  অনেক  কমে  এসেছে।  কারণ  ইদানীং  টিকা  নিয়ে  মৃত্যুবরণ  করা  অথবা  কঠিন  রোগে  আক্রান্ত  হওয়া  শিশুদের  পিতা-মাতারা  ফটাফট  আদালতে  মামলা  ঠুকে  দেন  এবং  আদালতও  ঝটপট  টিকা  কোম্পানির  কাছ  থেকে  কোটি  কোটি  টাকা  জরিমানা  আদায়  করে  দেন।

সে  যাক,  কোন  জীবাণু  বা  কোন  ঔষধি  পদার্থ  যেই  রোগ  সৃষ্টি  করে,  সেই  জীবাণু  বা  পদার্র্থকে  একেবারে  ক্ষুদ্রতম  মাত্রায়  ব্যবহার  করে  সেই  রোগের  চিকিৎসা  করা  বা  সেই  রোগ  প্রতিরোধ  করা  হলো  হোমিওপ্যাথির  মূলনীতি।  এলোপ্যাথিক  টিকা  হলো  হোমিওপ্যাথিক  নীতির  আংশিক  অনুকরণ  মাত্র।  লুই  পাস্তুর  জলাতঙ্কের  টিকা  আবিস্কারেরও  পঞ্চাশ  বছর  আগে  আমেরিকান  হোমিও  চিকিৎসাবিজ্ঞানী  ডাঃ  কন্সট্যান্টাইন  হেরিং  জলাতঙ্ক (Hydrophobia/Rabies)  রোগের  ভাইরাস  থেকে  জলাতঙ্কনাশী  ঔষধ  হাইড্রোফোবিনাম (Hydrophobinum/ Lyssinum)  তৈরী  করে  জলাতঙ্ক  চিকিৎসায়  সফলতার  সাথে  ব্যবহার  করেছেন।  বিজ্ঞানী  কচ  যক্ষ্মার  টিকা  আবিষ্কারেরও  চার  বছর  পূর্বে  ব্রিটিশ  হোমিও  চিকিৎসাবিজ্ঞানী  ডাঃ  বার্নেট  যক্ষ্মার  জীবাণু  থেকে  ব্যাসিলিনাম (Bacillinum)  নামক  ঔষধ  তৈরী  করেছেন  যা  শতবর্ষ  পরেও  অদ্যাবধি  যক্ষ্মা  রোগের  চিকিৎসা  ও  প্রতিরোধে  কার্যকর  প্রমাণিত  হচ্ছে।  কিন্তু  হোমিওপ্যাথিক  ঔষধগুলি  তৈরীতে  সরাসরি  রোগের  জীবিত  জীবাণু  ব্যবহৃত  হয়  না,  বরং  ক্রমাগত  ঘর্ষণের  মাধ্যমে  জীবাণুকে  ছিন্নবিচ্ছিন্ন  করা  হয়  এবং  খুবই  সূক্ষ্মমাত্রায়  শক্তিকৃত  অবস্থায়  ব্যবহৃত  হয়ে   থাকে।  এই  কারণে  রোগ  প্রতিরোধে  এগুলো  খুবই  কার্যকর  এবং  এদের  পার্শ্বপ্রতিক্রিয়া  নাই  বললেই  চলে।  তাছাড়া  এগুলো  মুখে  খেলেই  চলে;  ইনজেকশনের  মতো  নিষ্টুরতাও  এতে  নেই।  তাই  রোগ  প্রতিরোধ  বা  টিকা  নেওয়ার  কথা  চিন্তা  করলে  আমাদের  হোমিওপ্যাথিক  ঔষধের  ওপরই  নির্ভর  করা  উচিত।

সর্বোপরি  ডিপথেরিয়া,  ধনুষ্টঙ্কার,  হেপাটাইটিস,  হাম,  পোলিও  ইত্যাদি  রোগের  কার্যকর  চিকিৎসা  এলোপ্যাথিতে  না  থাকলেও,  হোমিওপ্যাথিতে  মাত্র  পঞ্চাশ  পয়সার  ঔষধেই  এসব  রোগ  নিরাময়  করা  সম্ভব।  হল্যাণ্ডের  একজন  হোমিও  চিকিৎসা  বিজ্ঞানী  দাবী  করেছেন  যে,  যে-কোন  টিকাকে  হোমিওপ্যাথিক  পদ্ধতিতে  শক্তিকরণ  করে  ব্যবহারের  মাধ্যমে  সেই  টিকার  ক্ষতিকর  পার্শ্বপ্রতিক্রিয়ার  চিকিৎসা  করা  সম্ভব।  তার  এই  ঘোষণাকে  সমর্থন  করেছেন  রাণী  এলিজাবেথের  প্রাক্তন  চিকিৎসক  মার্গারি  গ্রেস  ব্ল্যাকি।  অস্ট্রিয়ার  হোমিও  চিকিৎসাবিজ্ঞানী  জর্জ  ভিথুলকাস  মনে  করেন,  টিকা  প্রথা  ঔষধের  প্রতি  ব্যক্তির  সংবেদনশীলতা  বা  সাসসেপটিভিলিটি  নীতিকে  লংঘন  করে,  এটি  হোমিওপ্যাথির  মূলনীতি  বিরোধী  এবং  সমগ্র  মানবজাতির  স্বাস্থ্যকে  অবনতির  দিকে  নিয়ে  যায়।  টিকা  হলো  নিষ্পাপ  এবং  অসহায়  শিশুদের  উপর  একটি  পৈশাচিক  বর্বরতা।  যেহেতু  আমরা  কেউ  জানি  না,  আল্লাহ  কোন  শিশুর  ভাগ্যে  যক্ষা-ডিপথেরিয়া  লিখে  রেখেছেন  আর  কোন  শিশুর  ভাগ্যে  হুপিং  কাশি-ধনুষ্টঙ্কার  নির্ধারিত  করে  রেখেছেন;  সেহেতু  আন্দাজে  আট-দশটি  মারাত্মক  রোগের  জীবিত  জীবাণু  শিশুর  অনুমতি  ছাড়াই  জোরপূর্বক  তার  শরীরে  ঢুকিয়ে  দেওয়াকে  একেবারেই  অপ্রয়োজনীয়  নিষ্টুরতা  ছাড়া  আর  কিছুই  বলা  যায়  না।  টিকা  নিলে  শিশুর  কোন  না  কোন  ক্ষতি  হবেই;  হতে  পারে  তা  ছোট  কিংবা  বড়।  আবার  টিকা  নেওয়ার  ক্ষতিটা  প্রকাশ  পেতে  পারে  কয়েক  মিনিট,  কয়েক  ঘণ্টা,  কয়েক  দিন,  কয়েক  মাস,  কয়েক  বছর  এমনকি  কয়েক  যুগ  পরে।  অনেক  জ্ঞানীব্যক্তি  মনে  করেন  যে,  শিশুদের  রোগ  মাত্রই  মারাত্মক  রোগ  এমনটা  ধারণা  করা  সঠিক  নয়।  তারা  বিস্মিত  হন  এই  ভেবে  যে,  শিশুদের  ইমিউনিটি (Immunity)  গঠনের  জন্য  এত  কিছু  করতে  হবে  কেন ?  বুকের  দুধ  এবং  স্বাভাবিক  খাবারই  তাদের  ইমিউনিটি  বা  রোগ  প্রতিরোধ  শক্তি  গঠনের  জন্য  যথেষ্ট।  অনেক  পিতা-মাতা  প্রথমবার  টিকা  নেওয়ার  পর  শিশুর  ওপর  তাদের  ক্ষতিকর  ক্রিয়া  লক্ষ্য  করে  ডাক্তারদের  বললে  (না  জানার  কারণে  বা  টিকার  বদনাম  হবে  মনে  করে)  ডাক্তাররা  সেটি  টিকার  কারণে  হয়েছে  বলে  স্বীকার  করেন  না।  ফলে  ডাক্তারদের  আশ্বাসে  দ্বিতীয়বার  বা  তৃতীয়বার  টিকা  নেওয়ার  ফলে  দেখা  যায়  শিশুর  এমন  মারাত্মক  ক্ষতি  হয়ে  যায়,  যার  আর  কোন  প্রতিকার  করা  যায়  না।

যদিও  বলা  হয়ে  থাকে  যে,  টিকা  না  নেওয়া  শিশুরা  টিকা  নেওয়া  শিশুদের  জন্য  বিপজ্জনক।  কিন্তু  প্রকৃত  সত্য  হলো,  টিকা  নেওয়া  শিশুরাই  বরং  অন্য  শিশু  এবং  বয়ষ্ক  লোকদের  জন্য  বিপজ্জনক।  কেননা  সমপ্রতি  টিকা  নেওয়া  শিশুরা  সে-সব  রোগের  জীবাণু  তাদের  শরীরে  বহন  করে  থাকে,  তাদের  সংস্পর্শে  এসে  অন্য  শিশুরা  এবং  বয়ষ্ক  লোকেরা  সে-সব  রোগের  আক্রান্ত  হতে  পারেন,  বিশেষত  যাদের  ইমিউনিটি  বা  রোগ  প্রতিরোধ  শক্তি  দুর্বল।  আর  এভাবেই  ‘তথাকথিত’  অনেক  মহামারীর  সৃষ্টি  এবং  বিস্তার  করেছে  টিকা  নেওয়া  শিশুরা ;  যদিও  এজন্য  দায়ী  করা  হয়  টিকা  না  নেওয়া  শিশুদেরকে।  অন্যদিকে  ঠিক  একই  প্রক্রিয়ায়  টিকা  না  নেওয়া  শিশুরা  টিকা  নেওয়া  শিশুদের  সাথে  মেলামেশার  মাধ্যমে  পরোক্ষভাবে  সংশ্লিষ্ট  রোগের  ইমিউনিটি  লাভ  করে  থাকে।  টিকার  সমর্থকরা  মনে  করে  থাকেন,  এভাবে  সম্পূর্ণ  ঝুঁকিমুক্তভাবে  টিকা  না  নেওয়া  শিশুরা  উপকৃত  হয়ে  থাকেন।  এটা  একটি  অদ্ভূত  যুক্তি  কেননা  তারা  একই  সাথে  বলে  থাকেন  যে,  শিশুকে  টিকা  না  দিয়ে  তাদেরকে  অতিমাত্রায়  ঝুঁকির  মধ্যে  ফেলে  রেখে  সংশ্লিষ্ট  পিতামাতা  একটি  দ্বায়িত্বজ্ঞানহীন  কাজ  করে  থাকেন।  পরিসংখ্যান  অনুযায়ী  পোলিও  টিকা  নেওয়া  শিশুদের  সংস্পর্শে  আসার  মাধ্যমে  যুক্তরাষ্ট্রে  প্রতি  বছর  অন্তত  দশ  ব্যক্তি  পোলিও  রোগে  আক্রান্ত  হয়ে  চিরতরে  পঙ্গু  হয়ে  থাকে।  টিকার  ব্যবসায়ের  সবচেয়ে  শয়তানী  দিক  হলো,  এগুলো  কিভাবে  তৈরী  করা  হয়  তা  টিকা  কোমপানিগুলো  বিস্তারিত  প্রকাশ  করে  না।  একচেটিয়া  মাল  কামানোর  সুযোগ  হাত  ছাড়া  হয়ে  যেতে  পারে  ভেবে  তারা  এই  গোপনীয়তা  অবলম্বন  করে।  অথচ  এলোপ্যাথিক,  হোমিওপ্যাথিক,  ইউনানী,  আয়ুর্বেদিকসহ  পৃথিবীর  সকল  ঔষধেরই  উৎপাদন  প্রক্রিয়াতে  কোন  গোপনীয়তা  নেই;  এগুলো  সবই  একটি  প্রকাশ্য  বিষয়,  সবার  জন্য  উন্মোক্ত।

চিকিৎসা  বিজ্ঞানীদের  মতে,  টিকার  মাধ্যমে  শরীরে  প্রবেশ  করা  সংশ্লিষ্ট  রোগের  ভাইরাস  প্রায়  সারাজীবনই  শরীরে  থেকে  যায় (এবং  নিশ্চয়ই  তার  অপকর্ম  সমানে  চালাতে  থাকে)।  আবার  কেউ  কোন  দেশে  পর্যটনের  যাওয়ার  চেষ্টা  করলে  টিকা  কোম্পানীর  লোকেরা  তাদেরকে  ভীতি  প্রদর্শন  করতে  থাকে  যে,  সেই  দেশে  গিয়ে  আপনি  অমুক  অমুক  রোগে  আক্রান্ত  হতে  পারেন।  কাজেই  যাওয়ার  পূর্বেই  সে-সব  রোগের  টিকা  নিয়ে  যান।  ফলে  অনেকেই  এক  বসত্মা  টিকা  নিয়ে  এমনই  অসুস’  হয়ে  পড়েন  যে,  তার  আর  সেই  দেশে  পর্যটনে  যাওয়াই  সম্ভব  হয়  না।  টিকার  অত্যাচার  সবচেয়ে  বেশী  ঘটে  থাকে  সৈন্যদের  ওপরে।  ইরাকে  পাঠানোর  পূর্বেও  আমেরিকান  সৈন্যদের  এনথ্রাক্স (Anthrax),  মেনিনজাইটিস (Meningitis)  প্রভৃতি  রোগের  টিকা  পাইকারী  হারে  দেওয়া  হয়েছে।  ফলশ্রুতিতে  অনেক  সৈন্য  টিকার  প্রতিক্রিয়ায়  এমনই  অসুস’  হয়ে  পড়েছে  যে,  তাদের  আর  ইরাক  যুদ্ধেই  যাওয়া  হয়  নাই।  যুক্তরাষ্ট্রের  ন্যাচারোপ্যাথিক  চিকিৎসা  পদ্ধতির  প্রবর্তক  বেনেডিক্ট  লাস্ট  টিকা  প্রথার  তীব্র  বিরোধীতা  করে  বলেন  যে,  আগের  কালের  এসব  ভুয়া  সিষ্টেমের  দ্বারা  রোগ  চিকিৎসায়  কোন  উপকার  তো  হয়ই  না  বরং  ইহার  দ্বারা  পবিত্র  মানব  শরীরে  মারাত্মক  পীড়াদায়ক  ক্ষত  বা  আঘাতের  সৃষ্টি  হয়ে  থাকে।

ন্যাচারোপ্যাথিক  ডাক্তারদের  মধ্যে  পরিচালিত  একটি  জরিপে  দেখা  গেছে  যে,  অধিকাংশ  ন্যাচারোপ্যাথিক  চিকিৎসক (Naturopathic  Doctors)  পাইকারী  টিকা  কর্মসূচীকে  মনে  করেন  প্রাকৃতিক  নীতিবিরুদ্ধ,  অপ্রয়োজনীয়  এবং  বড়লোকী  কারবার।  ন্যাচারোপ্যাথিক  চিকিৎসকদের  এসোসিয়েশনের  এক  সাধারণ  সভায়  যে  প্রস্তাব  পাশ  করা  হয়েছে,  তাতে  সুপারিশ  করা  হয়েছে  যে,  টিকা  খুবই  ক্ষতিকর  এবং  অদরকারী  একটি  বিষয় ;  সুতরাং  এসব  বর্জনের  জন্য  শিশুদের  পিতামাতাকে  উৎসাহ  দিতে  হবে।  শিশুদের  অস্বাভাবিক  সামাজিক  আচরণ  বা  বুদ্ধিপ্রতিবন্ধিত্ব  অর্থাৎ  অটিজমের  একটি  মূল  কারণ  যে  এই  টিকা,  এ  বিষয়ে  বিস্তারিত  তথ্যপ্রমাণ  সম্বলিত  মোটামোটা  বই-পুস্তক  ইউরোপ-আমেরিকার  বইয়ের  দোকানগুলোতে  দেখতে  পাবেন।  মেনিনগোকক্কাল  মেনিনজাইটিসের  টিকা  নেওয়ার  পরে  যখন  খবর  পাওয়া  গেলো  যে,  অনেক  লোক  গুলেন-বেরি  সিনড্রোমে (Guillain  Barrĕ  Syndrome)  আক্রান্ত  হয়ে  প্যারালাইসিস  বা  মৃত্যুর  শিকার  হচ্ছে,  তখন  ফ্রান্স  সরকার  সেটি  নিষিদ্ধ  ঘোষণা  করেন।  টিকার  ক্ষতিকর  দিক  নিয়ে  আজ  পযর্ন্ত  যত  গবেষণা  হয়েছে,  সেগুলো  বিস্তারিত  অধ্যয়ন  করলে  যে  কারো  এমন  ধারণা  হতে  পারে  যে,  আধুনিক  যুগে  মানুষ  এবং  গৃহপালিত  পশু-পাখিদের  যত  রোগ  হয়,  তার  শতকরা  নিরানব্বই  ভাগ  রোগই  বুঝি  এই  টিকার  কারণেই  হয়।  হ্যাঁ,  সত্যি  তাই ;  এমন  মনে  হওয়াটা  মিথ্যে  নয়।  সম্প্রতি  ল্যানসেট (Lancet)  নামক  একটি  বিখ্যাত  মেডিকেল  জার্নালে  প্রকাশিত  এক  গবেষণা  প্রবন্ধে  দাবী  করা  হয়েছে  যে,  তৃতীয়  বিশ্বের  গরীব  দেশগুলো  জাতিসংঘের  কাছ  থেকে  বেশী  বেশী  আর্থিক  সাহায্যের  আশায়  তাদের  দেশের  শিশুদের  বেশী  বেশী  টিকা  নেওয়ার  মিথ্যা  তথ্য  দিয়ে  থাকে।  শেষকথা  হলো,  রোগমুক্ত  থাকার  জন্য  যে-সব  শর্ত  আমাদের  মেনে  চলা  উচিত  তা  হলো- পুষ্টিকর  খাবার  গ্রহন  করা,  পর্যাপ্ত  শারীরিক  পরিশ্রম  বা  ব্যায়াম  করা  এবং  শরীরের  জন্য  ক্ষতিকর  বিষয়সমূহ  থেকে  দূরে  থাকা।  অন্যথায়  আপনি  হাজার  বার  টিকা  নিয়েও  রোগের  হাত  থেকে  নিস্তার  পাবেন  না।  আসুন  আমরা  সবকিছু  সম্পর্কে  জানার  চেষ্টা  করি  এবং  এভাবে  নিজেদেরকে  সর্বনাশের  হাত  থেকে  রক্ষা  করি।

ডাঃ  বশীর  মাহমুদ  ইলিয়াস

গ্রন্থকার,  ডিজাইন  স্পেশালিষ্ট,  ইসলাম  গবেষক,  হোমিও  কনসালটেন্ট

চেম্বার ‍ঃ  ১৩/ক – কে.  এম.  দাস  লেন (২য় তলা),

(হুমায়ুন  সাহেবের  রেলগেইটের  সামান্য  পশ্চিমে

এবং  হায়দার  ফামের্সীর  উপরে)

টিকাটুলী,  ঢাকা।

ফোন ঃ +৮৮০-০১৯১৬০৩৮৫২৭

E-mail : Bashirmahmudellias@hotmail.com

Website : http://bashirmahmudellias.blogspot.com

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সাক্ষাতের  সময় ‍ঃ  সন্ধ্যা  ৬:০০  টা  হইতে  রাত  ৯:০০  টা

Vaccines  and  their  effective  and  safe  homeopathic  alternatives (টিকার  হোমিওপ্যাথিক  বিকল্প  ব্যবস্থা) ঃ – এলোপ্যাথিক  টিকা  নেওয়ার  পর  কোন  অসুখ  হোক  বা  না  হোক  Thuja  occidentalis (শক্তি ৩০)  রোজ  একবেলা  করে  দুই  সপ্তাহ  খেয়ে  রাখুন।  ঔষধটি  বড়িতে  কিনবেন  এবং  প্রতিবার  ৪/৫  টি   করে  বড়ি  খাবেন।  এতে  টিকা  নেওয়ার  ফলে  যে-সব  রোগ  হয়েছে,  সেগুলো  চলে  যাবে  এবং  ভবিষ্যতে  যে-সব  রোগ  হওয়ার  সম্ভাবনা  আছে,  সেগুলো  আর  হবে  না।  যখনই  কোন  টিকা  নিবেন,  পাশাপাশি  থুজা  নামক  হোমিও  ঔষধটিও  সেবন  করবেন।  তাতে  টিকার  ক্ষতিকর  পার্শ্বপ্রতিক্রিয়া  থেকে  বেচেঁ  যাবেন।

*  যক্ষা  প্রতিরোধের  জন্য  বি.সি.জি.  টিকার  বদলে  Bacillinum (শক্তি ৩০  অথবা  ২০০)  নামক  হোমিও  ঔষধটি  মাসে  একমাত্রা  করে  তিন  মাস  খাওয়ান (জন্মের  পর  থেকে  এক  বছর  বয়সের  মধ্যে)।

*  শিশুর  ডিপথেরিয়া  প্রতিরোধের  জন্য  ডি.পি.টি.  টিকার  বদলে  Diphtherinum (শক্তি  ৩০  অথবা  ২০০)  নামক  হোমিও  ঔষধটি  মাসে  একমাত্রা  করে  তিন  মাস  খাওয়ান (জন্মের  নয়  থেকে  বারো  মাসের  মধ্যে)।

*  শিশুর  ধনুষ্টঙ্কার  প্রতিরোধের  জন্য  এ.টি.এস.  অথবা  ডি.পি.টি.  টিকার  বদলে  Hypericum  perforatum (শক্তি ৩০  অথবা  ২০০)  নামক  হোমিও  ঔষধটি  মাসে  একমাত্রা  করে  তিন  মাস  খাওয়ান (জন্মের  ছয়  সপ্তাহ  পর  থেকে)।

*  শিশুর  হুপিং  কাশি  প্রতিরোধের  জন্য  ডি.পি.টি.  টিকার  বদলে  Pertussinum (শক্তি ৩০  অথবা  ২০০)  নামক  হোমিও  ঔষধটি  মাসে  একমাত্রা  করে  তিন  মাস  খাওয়ান (জন্মের  ছয়  সপ্তাহ  পর  থেকে)।

*  শিশুর  পোলিওমায়েলাইটিস  রোগ  প্রতিরোধের  জন্য  পোলিও  টিকা  খাওয়ানোর  বদলে  Lathyrus  sativus  (শক্তি  ৩০  অথবা  ২০০)  নামক  হোমিও  ঔষধটি  মাসে  একমাত্রা  করে  তিন  মাস  খাওয়ান (জন্মের  ছয়  সপ্তাহ  পর  থেকে)।

*  শিশুর  হাম  প্রতিরোধের  জন্য  মিজেলস  ভ্যাকসিনের  বদলে  Morbillinum (শক্তি ৩০  অথবা  ২০০)  নামক  হোমিও  ঔষধটি  মাসে  একমাত্রা  করে  তিন  মাস  খাওয়ান (জন্মের  নয়  থেকে  বারো  মাসের  মধ্যে)।

*  শিশুর  বা  বয়ষ্কদের  কলেরা  বা  ডায়েরিয়া  প্রতিরোধের  জন্য  এ.সি.ভি.  টিকার  বদলে  Veratrum  album  (শক্তি ৩০  অথবা  ২০০)  নামক  হোমিও  ঔষধটি  মাসে  একমাত্রা  করে  দুই  মাস  খাওয়ান (জন্মের  দুই  বছর  পরে)।

*  শিশুর  বা  বয়ষ্কদের  টাইফয়েড  জ্বর  প্রতিরোধের  জন্য  টি.এ.বি.  টিকার  বদলে  Typhoidinum (শক্তি ৩০  অথবা  ২০০)  নামক  হোমিও  ঔষধটি  মাসে  একমাত্রা  করে  দুই  মাস  খাওয়ান (জন্মের  দুই  বছর  পরে)।

*  শিশুর  জন্মের  ২/১  সপ্তাহের  মধ্যে  তাকে  Sulphur (শক্তি ২০০)  একমাত্রা  এবং  ৪/৫  সপ্তাহের  মধ্যে  সালফার  (শক্তি ২০০)  আরেক  মাত্রা  খাওয়ান।  তৃতীয়  মাসের  পরে  Calcarea  Carb (শক্তি ২০০)  প্রতিমাসে  একমাত্রা  করে  অন্তত  তিনমাত্রা  খাওয়ান  যাতে  তার  দাঁত  ওঠতে  কোনো  ঝামেলা  না  হয়।

পিতা-মাতার  দোষ  যাতে  সন্তানের  মধ্যে  সংক্রমিত  না  হয়  সেজন্যে  গর্ভাবস্থায়  গর্ভবতী  মাকে  নিম্নোক্তভাবে  ঔষধ  খাওয়ান ঃ- 

* পিতা-মাতা  বামন (অর্থাৎ  একেবারে  খুবই  বেটে-খাটো)  হলে  গর্ভাবস্থায়  Calcarea carb (শক্তি ২০০)  মাসে  অন্তত  একমাত্রা  করে  খাওয়ান।

* পিতা-মাতার  হাঁপানী  থাকলে  গর্ভাবস্থায়  Natrum Sulph (শক্তি ২০০)  মাসে  অন্তত  একমাত্রা  করে  খাওয়ান।

* পিতা-মাতার  বাতরোগ  থাকলে  গর্ভাবস্থায়  Medorrhinum (শক্তি ২০০)  মাসে  অন্তত  একমাত্রা  করে  তিনমাস  খাওয়ান।

* পিতা-মাতার  ক্যান্সার  থাকলে  গর্ভাবস্থায়  Carcinosin (শক্তি ২০০)   মাসে  একমাত্রা  করে  খাওয়ান  তিনমাস।

* পিতা-মাতার  ঘনঘন  ঠান্ডা  লাগার  দোষ  থাকলে  গর্ভাবস্থায়  Tuberculinum (শক্তি ২০০)  মাসে  একমাত্রা  করে  অন্তত  তিনমাস  খাওয়ান।

* পিতা-মাতার  সিফিলিস  হয়ে  থাকলে  গর্ভাবস্থায়  Syphilinum (শক্তি ২০০)  প্রতিমাসে  একমাত্রা  করে  খাওয়ান  চারমাস।

* পিতা-মাতার  গনোরিয়া  থাকলে  গর্ভাবস্থায়  Medorrhinum (শক্তি  ২০০)  মাসে  একমাত্রা  করে  খাওয়ান  তিনমাস।

* পিতা-মাতার  চর্মরোগ  থেকে  থাকলে  গর্ভাবস্থায়  Sulphur  (শক্তি  ২০০)  মাসে  একমাত্রা  করে  খাওয়ান  তিনমাস।

* পিতা-মাতার  দুর্গন্ধযুক্ত  চর্মরোগ  থাকলে  গর্ভাবস্থায়  Psorinum (শক্তি ২০০)  মাসে  একমাত্রা  করে  খাওয়ান  তিনমাস।

* পিতা-মাতার  হাড়  বিকৃতির  রোগ  থাকলে  গর্ভাবস্থায়  Silicea (শক্তি  ২০০)  মাসে  একমাত্রা  করে  খাওয়ান।

* পিতা-মাতার  যক্ষারোগ  হয়ে  থাকলে  গর্ভাবস্থায়  Bacillinum (শক্তি ২০০)  মাসে  একমাত্রা  করে  খাওয়ান  তিনমাস।

* যে  মহিলার  একবার  রিকেটগ্রস্ত  পঙ্গু  সন্তান  বা  ঠোটকাটা-তালুকাটা  সন্তান  হয়েছে  তাকে  গর্ভাবস্থায়  Calcarea phosphoricum (শক্তি ৩০)  সপ্তাহে  একমাত্রা  করে  দুই  মাস  খাওয়ান।  যে-মায়ের কখনও পঙ্গু বা ঠোট-কাটা, তালু-কাটা সন্তান হয়নি, তারও গর্ভাবস্থায়  ক্যালকেরিয়া  ফস  ঔষধটি অন্তত সপ্তায় একমাত্রা করে খাওয়া উচিত।  কেননা এটি আপনার শিশুকে সুন্দর চর্ম, সুন্দর অঙ্গ-প্রত্যঙ্গ, সুগঠিত হাড়, প্রখর ব্রেন বা উৎকৃষ্ট মেধা নিয়ে জন্ম নিতে সাহায্য করবে।

40 Infallible Reasons Why You Should Not Vaccinate Infants

By Jagannath Chatterjee (Fighting Vaccines Since 1985)
August 30, 2008

 

  1. There is no scientific study to determine whether vaccines have really prevented diseases. Rather disease graphs show vaccines have been introduced at the fag end of epidemics when the disease was already in its last stages. In case of Small Pox the vaccine actually caused a great spurt in the incidence of disease killing thousands before public outcry led to its withdrawal.
  2. There are no long-term studies on vaccine safety. Very short-term unscientific tests are carried out where the vaccinated subjects are checked against another group who are given another vaccine. Technically the tests should be carried out against a non-vaccinated group. No one really knows what protocols are followed at such industry-sponsored trials.
  3. There has never been any attempt to compare a vaccinated population against a non vaccinated population to know what vaccines are doing to the children and the society.
  4. The child receives not one but many vaccines. There are no tests to determine the effects of multiple vaccines.
  5. There is no scientific basis for vaccinating infants. As per senior doctors quoted by the Times of India, “Children suffer from less that 2% of vaccine preventable illnesses but 100% of the vaccines are targeted towards them.” The vaccine pioneers who have recommended abundant caution before vaccinating the population have never advocated Mass vaccinations.
  6. Children are vaccinated simply because parents can be frightened to forcefully vaccinate their children. Vaccinating infants is the most profitable business both for the manufacturers as well as the doctors.
  7. The Government of India has come out with a quarter page advertisement in The Hindu warning parents not to vaccinate beyond the Government approved vaccines. Parents have been advised against vaccinating in private clinics and hospitals.
  8. The Orissa Chapter of the Indian Association of Pediatricians has admitted in a letter to the CM, Orissa, that private clinics and hospitals are ill equipped to store vaccines and warned parents not to vaccinate upon the advise of private practitioners and hospitals.
  9. ALL THE VACCINE INGREDIENTS ARE EXTREMELY TOXIC IN NATURE.
  10. Vaccines contain heavy metals, cancer causing substances, toxic chemicals, live and genetically modified viruses, contaminated serum containing animal viruses and foreign genetic material, extremely toxic decontaminants and adjuvants, untested antibiotics, none of which can be injected without causing any harm.
  11. The mercury, aluminum and live viruses in vaccines is behind the huge epidemic of autism (1 in 10 worldwide as per doctors in the USA), a fact that has been admitted by the US Vaccine Court.
  12. The CDC of USA, the vaccine watchdog, has publicly admitted that its much-publicized 2003 study denying any link between vaccines and autism, is flawed. The Chief of CDC Dr Gerberding has confessed to the media (CNN) that vaccines can cause “autism like symptoms”. The Autism epidemic is found only in those countries that have allowed mass vaccinations.
  13. In the year 1999, the US Government instructed vaccine manufacturers to remove mercury from vaccines “with immediate effect”. But mercury still remains a part of many vaccines. The vaccines with mercury were never recalled and were given to children up to the year 2006. “Mercury free” vaccines contain 0.05mcg of mercury, enough to permanently damage a infant.
  14. IN INDIA NO ATTEMPT HAS BEEN MADE TO ENSURE THAT MERCURY AND OTHER HEAVY METALS ARE REMOVED FROM VACCINES SIMPLY BECAUSE IT WOULD MAKE VACCINES COSTLIER.
  15. In a reply to then President Sri Abdul Kalam, the Health Ministry informed, “mercury is required to make the vaccines safe”. To the authors query that “what are these vaccines that it requires the second most dangerous neurotoxin, mercury, to make them safe?”, there was no reply.
  16. Mercury used in vaccines is second in toxicity only to the radioactive substance, Uranium. It is a neurotoxin that can damage the entire nervous system of the infant in no time.
  17. Mercury accumulates in fat. The brain being made entirely of fat cells, most of the mercury accumulates there giving rise to the peculiar symptoms of the autistic children.
  18. The mercury used in vaccines is ethyl mercury. According to Indian doctors this is 1000 times more toxic than the usual methyl mercury.
  19. The aluminum present in vaccines makes the mercury, in any form, 100 times more toxic.
  20. As per an independent study aluminum and formaldehyde present in vaccines can increase the toxicity of mercury, in any form, by 1000 times.
  21. As per a Tehelka article on Autism, children are receiving 250 times more mercury through vaccines than they can possibly tolerate. The same article states that if one considers the WHO limit for mercury in water, they are receiving 50,000 times the limit. The limits set, incidentally, are for adults and not infants.
  22. Autism in India has emerged as the most rapidly growing epidemic amongst children. From 1 in 500 it has steadily climbed to 1 in 37 today. As per Indian doctors, “You can go to any class of any school today and find an autistic child.”
  23. Autism is a permanent disability that affects the child physically, mentally and emotionally. It makes the child loose social contact. It impedes both the physical and mental growth of the child. It destroys the brain causing severe memory and attention problems. According to vaccine researcher Dr Harris Coulter, vaccines cause children to become pervert and criminal. All the school shootings by the children in the USA are by autistic children. Vaccines can cause more harm that even the medical community privately acknowledges.
  24. Autistic children also suffer from severe bowel disorders. As per Dr Andrew Wakefield, this is due to the vaccine strain live measles virus in the MMR vaccine. Nearly all children become fully autistic after the MMR shot.
  25. The DPT also causes children to regress giving rise to fears that multiple live virus vaccines are an important cause behind autism. If three live viruses can cause so much harm we can well imagine what today’s five and seven viruses vaccines will do to children.
  26. Before the autism epidemic, it is already well known that vaccines have caused the cancer epidemic in today’s society. Both the Small Pox and the Oral Polio Vaccine are made from monkey serum. This serum has helped many cancer causing monkey viruses, 60 found so far, to enter the human blood stream.
  27. It is also known that it is the use of green monkey serum in vaccines that has led to the transfer of the Sivian Immune deficiency Virus (SIV) from monkeys into humans. The SIV and the HIV that causes AIDS are very similar.
  28. Not only AIDS, a blood cancer in infants (Acute Lymphoblastic Leukemia) that is affecting children in thousands is also due to the extremely toxic nature of vaccine ingredients.
  29. Infantile jaundice and also infantile diabetes is also scientifically connected to the toxic vaccines.
  30. The live polio viruses used in the Oral Polio Vaccine has caused Vaccine Attributed Paralytic Polio in more than 65,000 children as per doctors of the Indian Medical Association. In the USA this vaccine has caused polio 16 years after administration. The OPV has also let loose a new strain of polio in both India and Africa. The OPV is banned in other countries.
  31. Vaccines contain serum from not only chimpanzees and monkeys but also from cows, pigs, chickens, eggs, horses, and even human serum and tissues extracted from aborted fetuses.
  32. Deaths and permanent disability from vaccines is very common and known by the medical community. They are instructed by the Government to keep quiet and not to associate such cases with vaccines.
  33. Many doctors argue that diseases during childhood are due to the body exercising its immune system. Suppressing these diseases causes the immune system to remain undeveloped causing the various autoimmune disorders like diabetes and arthritis that have become epidemics today.
  34. Vaccines suppress the natural immunity and the body does not have natural antibodies anymore. The mothers milk therefore does not contain natural antibodies and can no longer protect the child against illnesses.
  35. In the USA vaccine adverse effects are recorded and the Government offers compensation of millions of dollars to victims (the most recent case in its Vaccine Court may have received upto $200 million in damages). The Indian Government simply refuses to acknowledge that vaccines can cause deaths and permanent disability.
  36. It has been scientifically proven that vaccines cannot prevent disease. Vaccines try to create humoral (blood related immunity) whereas it has been found that immunity is developed at various levels, humoral as well as cellular. We still do not know enough about the human immune system and therefore should not interfere with it.
  37. In the USA parents are informed about vaccine after effects and their consent has to be taken before vaccinating their children. In India the Government assures the population through massive advertising campaigns that vaccines are extremely safe. Parents refusing to vaccinate are threatened by the administration.
  38. THERE IS NO SYSTEM OF TREATMENT TO TREAT A VACCINE DAMAGED CHILD. The parents have to run from one hospital to another. The Government turns a blind eye and refuses to even acknowledge the vaccine connection.
  39. Medical doctors have challenged even the vaccines recommended by the Government of India. The BCG vaccine for tuberculosis has been extensively tested in India as long back as 1961 and found to be totally ineffective. The OPV is causing polio and other neurological and intestinal disorders in tens of thousands of Indian children. The Hep-B vaccine introduced recently is not meant for children at all, it is a vaccine for a sexually transmitted disease that should be targeted only at promiscuous adults. The tetanus vaccine contains both aluminum and mercury besides the tetanus toxoid.. The doctors themselves avoid the DPT as it is one of the most toxic vaccines ever devised. The measles vaccine is a vaccine that regularly causes severe adverse effects and the health workers want it out.
  40. The pediatricians are introducing dubious vaccines in India, which are being opposed by the doctors, politicians, and public in American and European countries. The Rotavirus vaccine, Hib vaccine, HPV vaccine and the various multi virus vaccines being introduced without any kind of testing is only because the vaccine manufacturers and the doctors administering them want to ensure a good income from them. They care two hoots about medical ethics and the fate of the children who will receive these vaccines. Vaccines containing nano particles and viruses and also plant based genetically modified vaccines are being opposed by honest doctors worldwide.

Article provided by Zeus Information services
www.zeusinfoservice.com

 

 

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